श्रीशः उपदंडक
श्रीशः उपदंडक
@1008
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RE: वर्ष २००९, एक साधना, अक्षुण्ण भार्या वेणुला!

"आचार्य जी?" कहा मैंने,"जी?" बोले वो,"एक बात पूछूं?" बोला मैं,"अवश्य!" बोला वो,अब तक, आचार्य जी को मुझ से बतलाते देख दिशि भी चली आयी थी, अब उसके चेहरे...

2 years ago
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RE: वर्ष २००९, एक साधना, अक्षुण्ण भार्या वेणुला!

तभी सरोज चली आयी! काले रंग की जींस में और नीले रंग की टीशर्ट में, देखने में कोई वैज्ञानिक नहीं, कोई ब्यूटी-सलून की मालकन सी लग रही थी, पांवों में उसने...

2 years ago
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RE: वर्ष २००९, एक साधना, अक्षुण्ण भार्या वेणुला!

तो उसे दो कीलें निकाल लीं और रख लीं! बहुत ही कम ऐसा होता है कि किसी जर्जर नाव की कीलें मिलें! इसके बाद हम, फिर थोड़ी देर वहीं रहे, आसपास का जायज़ लिया औ...

2 years ago
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RE: वर्ष २००९, एक साधना, अक्षुण्ण भार्या वेणुला!

खैर साहब! जितना समझना बस में था, समझा लिया! न उन्होंने माननी ही थी और न ही उन्होंने मानी! मेरे विचार उन्हें इस विषय पर, पहले भी बेमायनी लगे थे, और अब ...

2 years ago
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RE: वर्ष २००९, एक साधना, अक्षुण्ण भार्या वेणुला!

"मुझे तो लगा था वो पांडुलिपि विशेष होगी! इतने प्रबुद्ध लोग आये हैं, अवश्य ही कुछ न कुछ हल निकलेगा, लेकिन हल तो क्या, इनका तो काहल ही निकलता लगता है! ध...

2 years ago
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RE: वर्ष २००९, एक साधना, अक्षुण्ण भार्या वेणुला!

मैंने मुस्कुराते हुए, वो पैग उठाया, और चल पड़ा वापिस, बीच में ही वो पैग फेंक दिया! मुंह को रुमाल से पोंछा और वापिस बालचंद्र के पास चला आया! बालचंद्र, ल...

2 years ago
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RE: वर्ष २००९, एक साधना, अक्षुण्ण भार्या वेणुला!

"सरोज जी! सच कहूं?" कहा मैंने,"क्यों नहीं?" बोली वो,अब तो सरोज भी दबने सी लगी थी, मेरी तरफ ही! ये अच्छी बात थी, कम से कम इंसान दिमाग चला ले यहां तो बे...

2 years ago
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RE: वर्ष २००९, एक साधना, अक्षुण्ण भार्या वेणुला!

"बालचंद्र?" बोला मैं,"हां जी?" बोला वो,"ये सरोज अकेली है न?" पूछा मैंने,"हां!" बोला वो,"प्रिया कहां गयी?" पूछा मैंने,"पता नहीं!" बोला वो,''रुको, आया म...

2 years ago
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RE: वर्ष २००९, एक साधना, अक्षुण्ण भार्या वेणुला!

"बालचंद्र?" कहा मैंने,"जी?" बोलै वो,"ये लोग तो लौट आये!" कहा मैंने,"खाली हाथ!" बोला वो,"जगह ही गलत चुनी है!" कहा मैंने,"मतलब?" बोला वो,"इन्हें स्वर्ण ...

2 years ago
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RE: वर्ष २००९, एक साधना, अक्षुण्ण भार्या वेणुला!

ठीक साढ़े छह बजे, वे लोग अपना अपना काम छोड़ कर वापिस हुए उसी जगह! यहां अब एक कामचलाऊ कनात सी लगा दी गयी थी, पानी और खाने की कोई कमी न थी, स्पष्ट था कि य...

2 years ago
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RE: वर्ष २००९, एक साधना, अक्षुण्ण भार्या वेणुला!

लगभग तीन बजे हम एक गड्ढ में थे, दूर तक फैला था ये गड्ढ! गहरा भी था, लगता था कि जैसे कोई पर्वत उखाड़ कर फेंक दिया हो यहां से या फिर उल्का-पात हुआ हो इधर...

2 years ago
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RE: वर्ष २००९, एक साधना, अक्षुण्ण भार्या वेणुला!

"वैसे दिशि!" कहा मैंने,"अब क्या?" बोली वो,"खीझ क्यों रही हो?" पूछा मैंने,"सवाल ही खतम नहीं होते?" बोली वो,"ओ? सुनो?" कहा मैंने,"हां? बोलो?" बोली वो,"क...

2 years ago
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RE: वर्ष २००९, एक साधना, अक्षुण्ण भार्या वेणुला!

ये ज़मीन कुछ काली सी है! हैरत कि बात एक और! यहां, पत्थरों में से ही हरी वनस्पति भी फूटती है! कमाल ये कि न पानी, न मिट्टी! शायद नमी के कारण ही! यहां का ...

2 years ago
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RE: वर्ष २००९, एक साधना, अक्षुण्ण भार्या वेणुला!

तो मित्रगण! ठीक ग्यारह बजे दो बोलेरो गाड़ियां चल पड़ीं! एक में मैं और बालचंद्र, दो सहायक और दो ही महिलायें थीं, शेष लोग आगे वाली गाड़ी में थे, अब रास्ता ...

2 years ago
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RE: वर्ष २००९, एक साधना, अक्षुण्ण भार्या वेणुला!

चाय आ गयी थी, हमने चाय पीनी शुरू की! आचार्य जी खोये हुए थे इसी गहन विषय में, किसी भी कार्य, शोधादि में यदि जुनून न हो, तो वो शोध कच्चा ही रह जाता है! ...

2 years ago
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