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एक ऐसा, ज़हनी सिलसिला, जो एक ख़्वाब से शुरू हुआ था, अब दिल-ओ-दिमाग़ पर हावी होने को था! दिमाग़ की सभी दलीलें, खोखली होने को थीं! दिमाग़ की दीवारें अब चरमरा...
और जब दिल और दिमाग़ में जंग छिड़ा करती है, तो दिल, अक्सर ही, जज़्बात का सहारा ढूंढ लिया करता है! और ये जज़्बात, उसकी ढाल बन जाया करते हैं! अब दिमाग़, दिमाग़...
लेकिन! लेकिन, ये ख़्वाब नहीं था! जो गुजरा हो उसके साथ! या, अबज़ैर के असरात इसकी वजह हों! नहीं! क़तई नहीं! ये तो तस्सवुर था! तस्सवुर, सामिया का! ख़्वाब में...
लौट आई कमरे में अपने, ज़रा गौर से सुनने के लिए कान लगाए, तो कोई आवाज़ नहीं, शायद, मुग़ालता हुआ था उसे, उसने कुछ सुना ही नहीं था, शायद, कोई सिसकी नहीं थी,...
नोट नम्बर तेरह........................................मैं दो रात से सोया नहीं! आज दिन के दस बजे हैं! मुझे डॉक्टर ने कोई दवा भी नहीं दी, हां, कुछ जांच ...
और सामिया! चुप! खड़ी ही रही! अलफ़ाज़ ही न निकले! बस इंतज़ार करने लगी अबज़ैर के बोलने का! और अबज़ैर, बेचैन! बेखुद सा! बेखुद! हाँ, खुदी से अलहैदा! अलहैदा ही ख...
फिर कुछ लम्हों तक, सन्नाटा पसरा रहा! या तो समंदर की आवाज़ आती, या फिर, सामिया के दिल की धड़कन की आवाज़! कुछ और लम्हात आगे बढ़े! और तब, सामिया ने चेहरा घुम...
तो वो रात, आराम से कटी! उस रात कोई ख़्वाब नहीं आया! कहीं नहीं गयी वो घूमने अपने ख़्वाब में! नींद भी जल्दी आई थी, और उठ भी जल्दी ही गयी थी, नहा-धोकर तरो-...
हाँ! तो अब ये सवाल बेहद उलझन पैदा कर रहा है कि ये, अबज़ैर, आखिर है कौन? मैंने लिखा था कि ये एक अलग ही शय है, ये जिन्नात से भी अधिक ताक़तवर और खतरनाक हुआ...
ये ज़ाहिद था, सामिया के साथ ही पढ़ा करता था, और वकालत की पढ़ाई भी, साथ ही की थी उन्होंने, उसके पिता जी और बड़े भाई, वहीँ वकालत किया करते थे, और ज़ाहिद भी, ...
उसकी नज़र, घड़ी पर गयी, चार बजने को थे, वो उठ बैठी, उसके बाद, नींद नहीं आई उसे! हाँ, बदन में अलक़त सी मची रही, जैसे, कोई सर्द जगह से, एक झटके से, तपते रे...
तो हिना से बातें होती रहीं उसकी! हिना, रोज ही आ जाती थी सामिया के पास, सामिया के चाचा जी की लड़की थी हिना, सामिया से बेहद लगाव था उसको! साथ ही खेली थीं...
वो बढ़ रही थी आगे! धीरे धीरे, नज़रें सामने टिकाये हुए! हालांकि, अभी धुंधलका था, लेकिन वो बढ़ रही थी उस आहट की ओर! कोई तो था वहाँ! कोई तो! वो रुकी उधर! दे...
ख़्वाब! हाँ, ख़्वाब! कितना अजीब होता है न! अपने ही दिमाग़ में उपजी एक अनजान फ़सल! अपने ही सब्ज-बाग़! वो मुस्कुरा उठी थी! शायद, ये जानकर, कि क्या खूब खेल दि...
डॉक्टर नन्दिनी और अर्णव की ये बातें, ये वार्तालाप, उसके इलाज को एक नयी दिशा देने वाला था! अर्णव ने अपने सवाल और उनके उत्तरों द्वारा ये तो कम से कम ज़ाह...
