श्रीशः उपदंडक
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@1008
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RE: ज्ञान बाबू की डायरी, वर्ष १९८७....

''जूस वाले? ओ! अच्छा!" कहा उसने,और वो रुपये ले लिए मुझ से, बिन गिने ही जेब में रख लिए, थोड़ी असावधानी से!"और आपकी तबीयत कैसी है अब राजेश जी?" पूछा मैंन...

2 years ago
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RE: ज्ञान बाबू की डायरी, वर्ष १९८७....

"नहीं!" बोली वो,"क्यों नहीं?" पूछा मैंने,"तुम अब, घर के जैसे ही हो!" बोली वो,"शुक्रिया!" कहा मैंने,और भात का आनन्द उठाने लगा फिर मैं!तभी बाहर कुछ रौशन...

2 years ago
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RE: ज्ञान बाबू की डायरी, वर्ष १९८७....

"मुझे भूलोगे तो नहीं?" पूछा उसने,"नहीं!" कहा मैंने,"मेरी क़सम?" पूछा उसने,"इसमें क़सम क्या?" पूछा मैंने,"ऐतबार!" बोली वो,"मुझे भी!" कहा मैंने,"ज्ञान?" ब...

2 years ago
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RE: ज्ञान बाबू की डायरी, वर्ष १९८७....

वो गिलास लेकर, जाने को हुआ, कि मैं, उठा तभी..."अरे? किशन?" बोला मैं,वो रुक गया, पीछे नहीं पलटा लेकिन,"जी ज्ञान बाबू?" बोला वो,"तू नहीं जाता अपने गाँव?...

2 years ago
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RE: ज्ञान बाबू की डायरी, वर्ष १९८७....

तो जब क्लास खत्म हुई, तब तक साढ़े चार बज चुके थे! अब मैं वहाँ से गोल हुआ! और जा निकला बाहर! यहां से सवारी आराम से मिल जाया करती है, तो सवारी ली और फिर ...

2 years ago
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RE: ज्ञान बाबू की डायरी, वर्ष १९८७....

इस बार फिर से एक करारा सा, नोट निकाला सौ का, मुझे दिया और मैं, जूस लेने चला, जूस वाले ने बताया कि आज ऑरेंज भी मिलेगा और गुवावा भी! सो मैंने ऑरेंज जूस ...

2 years ago
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RE: ज्ञान बाबू की डायरी, वर्ष १९८७....

बड़े ही कमाल की बात थी ये तो? वो डॉक्टर यहां क्यों आता था बार बार? न उसका कोई काम ही था कोई यहां, जो था, वो उसने बता ही दिया था, न वो पढ़ाता ही था यहना ...

2 years ago
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RE: ज्ञान बाबू की डायरी, वर्ष १९८७....

"नहीं ज्ञान!" बोला वो,"तब यहीं क्या?" पूछा मैंने,"हाँ, यहीं!" बोला वो,"अँधेरे में?" पूछा मैंने,"अँधेरा, बुरा भी नहीं!" कहा उसने,"हाँ, दर्शनशास्त्र में...

2 years ago
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RE: ज्ञान बाबू की डायरी, वर्ष १९८७....

सीढ़ियों से नीचे आये हम दोनों, मैं, जैसे बकरा होऊं बलि का, जिसकी गर्दन में रस्सा बन्धा हो, जो मारे भय के मिमिया भी न सके, ऐसा हुआ पड़ा था! नीचे वो खाली ...

2 years ago
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RE: ज्ञान बाबू की डायरी, वर्ष १९८७....

और जैसे ही हाँ कही मैंने, मैं हुआ तीर वहाँ से! आज तो इज़्ज़त बच गयी थी, लेकिन खतरा तो बन ही गया था अब! अनीता और अरुमा से तो मैं निबट ही लेता, लेकिन इस ब...

2 years ago
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RE: ज्ञान बाबू की डायरी, वर्ष १९८७....

"आ जाया करो!" बोलीं वो,आ जाया? कहाँ?"कहाँ सविता जी?'' पूछा मैंने,"जी न कहो ज्ञान!" बोलीं वो,"आप बड़ी हैं!" कहा मैंने,"इतनी भी नहीं!" बोलीं वो,और सरक कर...

2 years ago
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RE: ज्ञान बाबू की डायरी, वर्ष १९८७....

"यहां तो आइये ज़रा?" बोलीं वो,"जी? यहीं हूँ?" कहा मैंने,"अरे अंदर आइये तो?" बोली वो,"अंदर राजेश जी नहीं?" पूछा मैंने,"उन्हें क्या मतलब! आइये आप!" बोलीं...

2 years ago
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RE: ज्ञान बाबू की डायरी, वर्ष १९८७....

अब मैं क्या कहूँ या क्या कहता! वैसे मुझे अपने ऊपर फ़ख्र तो था! यहां मेरी उम्र में, किसी को एक 'पौनी' भी नसीब नहीं होती और यहां मेरे नसीब में दो दो! ये ...

2 years ago
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RE: ज्ञान बाबू की डायरी, वर्ष १९८७....

मैं रुका ज़रा, उसको देखा, वो मेरे पीछे ही थी, सांकल हालांकि मैं तब खोलता जब वो इशारा करती, लेकिन सबब क्या था? किस वजह से बाहर चलूं मैं? कहाँ ले जा रही ...

2 years ago
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RE: ज्ञान बाबू की डायरी, वर्ष १९८७....

इस निमन्त्रण ने तो मेरे दिमाग में दो-फाड़ वाले दो रास्ते बना दिए थे! जाऊं या नहीं! जाऊं तो मजा हो! न जाऊं तो सजा! पता नहीं कब तक! अब ज़माना नया है, जानत...

2 years ago
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