श्रीशः उपदंडक
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@1008
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RE: ज्ञान बाबू की डायरी, वर्ष १९८७....

देखो जी, अब चाहे इस तरह से सुनो या उस तरह से! अँधा क्या चाहे? दो आँखें! तो पूछोगे अगर मेरी हालत उस वक़्त की, तो शायद ही बता सकूँ! ये तो महसूस करने की ब...

2 years ago
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RE: ज्ञान बाबू की डायरी, वर्ष १९८७....

"लेकिन किशन? तू यहां कैसे?" पूछा मैंने,"सामान लेने आया था बाबू जी" बोला वो,और झोले में रखा कुछ सामान सिखाया मुझे उसने!''आपको यहां देखा, तो दौड़ा चला आय...

2 years ago
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RE: ज्ञान बाबू की डायरी, वर्ष १९८७....

तो मैं करीब साढ़े आठ बजे, चाय नाश्ते से फारिग हुआ, अरुमा से पूछा कि कुछ लाना हो बाजार से तो ले आऊंगा मैं, अरुमा ने मना ही की, किशन से पूछी नहीं, मेरा क...

2 years ago
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RE: ज्ञान बाबू की डायरी, वर्ष १९८७....

उसी रात..............करीब एक बजे.....................................................मेरी नींद खुली, मुझे कुछ सुनाई दिया था, नींद के मारे हाल खराब था ...

2 years ago
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RE: ज्ञान बाबू की डायरी, वर्ष १९८७....

जैसे ही वो उठ कर गयी कि मुझे फिर से तेज जलने की सी दुर्गन्ध आयी! ये दुर्गन्ध कुछ ऐसी थी, कि जैसे फोटो-प्रिंटिंग एसिड में से आती है, मुंह में थूक आ जाए...

2 years ago
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RE: ज्ञान बाबू की डायरी, वर्ष १९८७....

सच पूछो तो मैंने दरवाज़ा इसीलिए खुला छोड़ा था कि कहीं फिर से, गलती से या हवा के झोंके से बन्द न हो जाए और मैं कहीं अंदर ही न फंस के रह जाऊं! फिर. यकायक ...

2 years ago
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RE: ज्ञान बाबू की डायरी, वर्ष १९८७....

वो एक बड़ी सी पेंटिंग थी, उस पूरी दीवार पर बनी हुई सी, हालांकि, कागज़ पर ही बनी थी, लेकिन लटकाई गयी उस दीवार पर थी! उस पेंटिंग में मेरा कमरा, उसका पीछे...

2 years ago
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RE: ज्ञान बाबू की डायरी, वर्ष १९८७....

बड़े ही आश्चर्य की बात थी! अरे भाई, मैं तो किरायेदार था, यहां अच्छा न मिले तो कहीं और सही! इसमें भला गुस्सा करने की क्या बात थी! यही बात मुझे समझ तो आय...

2 years ago
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RE: ज्ञान बाबू की डायरी, वर्ष १९८७....

"सही कहा ज्ञान! याद तो घर की बहुत आती है!" बोली वो,"हाँ, वो घर, बचपन की जगह, वो सब! यहां नहीं नसीब!" कहा मैंने,"वो तो कभी मिल ही नहीं पाता!" बोली वो,"...

2 years ago
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RE: ज्ञान बाबू की डायरी, वर्ष १९८७....

उस समय मेरे दिमाग में हिंडोले से डोल रहे थे! समझ ही नहीं आ रहा था कि क्या कहूँ? या क्या कहलवाऊं या क्या करूँ? या कैसे उन कुछ रहस्यों से पर्दा उठाया जा...

2 years ago
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RE: ज्ञान बाबू की डायरी, वर्ष १९८७....

मैं उसके साथ अंदर गया! अंदर अभी तक वही गुलदस्ता रखा था को कल भी थ, आज सुबह भी था और अभी भी था! उस गुलदस्ते पर एक अखबार भी मुड़ा हुआ रखा था, मैंने बैठने...

2 years ago
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RE: ज्ञान बाबू की डायरी, वर्ष १९८७....

पता नहीं मित्रगण पढ़ते क्या हैं! वो आंटी जी, महिला, उतर गयी थीं, अब रह गए थे ज्ञान बाबू और वो ड्राइवर! अब पता नहीं कौन सा किरदार? कहाँ से बिहारी आंटी? ...

2 years ago
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RE: ज्ञान बाबू की डायरी, वर्ष १९८७....

"कैसी शर्त सर?'' पूछा मैंने फिर से,"यही कि जूस के पैसे मैं दूंगा!" बोला वो हंसते हुए!मैं भी हंस पड़ा ये बात सुन कर!"इसमें इतनी बड़ी बात कहाँ सर! ये तो म...

2 years ago
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RE: ज्ञान बाबू की डायरी, वर्ष १९८७....

कमाल था इनसे तो, कमीज़ काली कैसे हुई? बस में तो हो नहीं सकती थी, यहां ऐसा कुछ नहीं? घर में भी ऐसा कुछ नहीं? फिर? वो भी कॉलर? समझ नहीं आया कुछ भी!"केशव ...

2 years ago
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RE: ज्ञान बाबू की डायरी, वर्ष १९८७....

और जब मैंने हंसना बन्द किया, तब तक वो संजीदा हो चुकी थी! मैंने उसकी तरफ देखा, वो शान्त सी खड़ी हुई मुझे ही देख रही थी!"क्षमा कीजिये!" कहा मैंने,"किसलिए...

2 years ago
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