श्रीशः उपदंडक
श्रीशः उपदंडक
@1008
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RE: वर्ष २०१४ जिला टोंक राजस्थान की एक घटना!

तो साहब, हमारी महफ़िल सज गयी! कमल साहब ने कोई क़सर न छोड़ी, क्या पनीर, क्या सलाद, क्या ग़ोश्त और क्या ज़ायक़ा! यहां भी उन्होंने अपने एक बचपन के लंग़ोटिये दोस...

2 years ago
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RE: वर्ष २०१४ जिला टोंक राजस्थान की एक घटना!

तो हम खा-पीकर फ़ारिग हुए! बाद में रुमाली रोटी खायी थीं, खाना तो बढ़िया था ही, जमकर खाया! लज़ीज़ खाना था, अब शील जी तो जा पहुंचे थे निन्द्रालोक में, हम भी ...

2 years ago
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RE: वर्ष २०१४ जिला टोंक राजस्थान की एक घटना!

"हाँ जी कमल साहब?" बोले शर्मा जी,"हाँ जी, तो मैं कहाँ था?" पूछा उन्होंने,"उसने मेहमान बनने को कहा था!" बोले शर्मा जी,"हाँ, हाँ तो उसने कहा कि बारात जा...

2 years ago
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RE: वर्ष २०१४ जिला टोंक राजस्थान की एक घटना!

बादल साहब बेचारे, बेहद ही परेशान हो उठे थे, इंसान के चेहरे के हाव-भाव सब बता दिया करते हैं, हालांकि उन्होंने कभी रौशन को देखा नहीं था, लेकिन फिर भी उस...

2 years ago
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RE: वर्ष २०१४ जिला टोंक राजस्थान की एक घटना!

वसीम फिर से खिड़की की तरफ गया देखने, झाका बाहर पर्दा हटा कर, अभी भी बारिश थी, उसके चेहरे के हाव-भाव से पता चल गया था! वो आया वापिस, और बैठ गया फिर से,"...

2 years ago
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RE: वर्ष २०१४ जिला टोंक राजस्थान की एक घटना!

जाम खतम कर लिए गए अपने अपने! आज तो कुछ बात ही अलग थी! मटन-टिक्के लाया था वसीम अब, गर्मागर्म! और जब ऊपर से, हरी चटनी और धनिये के पत्ते बुरके, तो समझो च...

2 years ago
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RE: वर्ष २०१४ जिला टोंक राजस्थान की एक घटना!

"हाँ हाँ कमल जी! फिर क्या हुआ, ये बताओ!" बोले शील जी, आलती-पालती मारते हुए!"हाँ जी, फिर क्या हुआ?" पूछा शर्मा जी ने,"तो जी, नगाड़े बज रहे थे, तड़ातड़! ले...

2 years ago
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RE: वर्ष २०१४ जिला टोंक राजस्थान की एक घटना!

"जी!" बोले शर्मा जी,"तो वो भी एक ऐसा ही गरम दिन था, उस दिन हाफ-डे था दफ्तर में, तो रौशन ने सोचा, ढाई-तीन बजे तक घर पहुँच जायंगे, और फिर चिलचिलाती धूप ...

2 years ago
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RE: वर्ष २०१४ जिला टोंक राजस्थान की एक घटना!

साँझ ढल चुकी थी, और वैसे भी सर्दी में अक्सर साँझ जल्दी ही ढल जाया करती है! उस रोज भी सर्दी का यौवन निखरा हुआ था, वो इठला रही थी और हम कुड़कुड़ा रहे थे! ...

2 years ago
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RE: वर्ष २०१४ जिला टोंक राजस्थान की एक घटना!

सुबह, बैरन नींद, जल्दी ही खुल गयी! ओहो! जैसे कूपे में सारी रात सर्दी पहरा दे कर गयी हो! क्या खिड़की और क्या खिड़की के संगीदार वो सरिये! सभी सर्दी के मार...

2 years ago
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RE: ज्ञान बाबू की डायरी, वर्ष १९८७....

पानी पिया तो मैंने बात सीधे ही आगे बढ़ा दी, दरअसल ये इस मकान के चौथे मकान-मालिक थे, और उन्हें अब बारह बरस हो चुके थे, घर में कोई अपशकुनि न हुई थी और क...

2 years ago
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RE: ज्ञान बाबू की डायरी, वर्ष १९८७....

और मैं, एक मकान के पीछे जा रुका! उस मकान की चारदीवारी हुई, हुई थी, लेकिन उसके बाद, एक शानदार सा मकान था! उस पर लाल पत्थर की टाइल्स लगी थीं! घर आलीशान ...

2 years ago
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RE: ज्ञान बाबू की डायरी, वर्ष १९८७....

गाड़ी धीमे हुई, मेरी नज़रें फौरन ही एक निशानी को देखने के लिए दौड़ पड़ीं! वो जच्चा-बच्चा केंद्र! वो अस्पताल! लेकिन वो कहीं नहीं था यहां, यहां, जहां उसे हो...

2 years ago
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RE: ज्ञान बाबू की डायरी, वर्ष १९८७....

कुछ देर बैठे हम और फिर खड़े हो गए! तभी देखा मैंने कि एक लड़की उनके लिए जूस ले आयी थी! उस जूस को देखा तो बरबस मेरे होंठों पर मुस्कान खिंच आयी! उनको जूस द...

2 years ago
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