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वो आवाज़ कभी तो गूँज जाती थी और कभी ऐसा लगता, कि जैसे किसी दूर गाँव-देहात में कोई बारात आई हो! नगाड़ों की आवाज़ बड़ी ही कंपी कंपी सी आ रही थी, ऐसा लगता था...
तो हम उस डगर पर चल पड़े थे अब! बारिश का असर तो साफ़ दीख पड़ता था! कहीं कहीं सड़क पर, सड़क के आसपास, पानी खड़ा हो गया था, अब कहाँ गड्ढा है और कहाँ नहीं, ये स...
बारिश तो कहर ढाने को आमादा थी! बादल गरज गरज के जैसे आग में घी का काम कर रहे थे! बारिश बोले ज़मीन से कि आज ढा दूँगी तुझे और ज़मीन बोले जितना बस चले, चला ...
तो साहब, हमारी महफ़िल जवान रही! तक़रीबन साढ़े ग्यारह बजे, बाहर से टपर-टपर की आवाज़ आई! साफ़ था कि बाहर बारिश पड़ने वाली है! ये बारिश से पहले की संदेसा-बूँद ...
वहाँ, सड़क किनारे, एक खंडहर सा बना था, लाल रंग का खंडहर, लखौरी ईंटों का सा, ये कोई बड़ी इमारत नहीं थी, दीवारें काफी बड़ी थीं, रही होंगी, अब तो ज़मीन से बा...
तो हम चाय आदि से भी फ़ारिग हुए! हमने काफी देर हो गयी थी, एक तो सर्दी का प्रकोप था, सूरज ने दर्शन नहीं दिए थे, हवाएँ बेहद तेज थीं, कोहरा भी अभी सुरागरसी...
थोड़ी ही देर में कमल साहब लौट आये, सामान गरम करवा दिया था उन्होंने, तो हम फिर से शुरू हो गए, अब बात हुई कल के विषय पर, कल हमें करीब ग्यारह बजे जाना था ...
"और साहब ये अस्थि-प्रवाह?" बोले शील जी,"बहुत अच्छा प्रश्न किया है आपने!" कहा मैंने,मैंने सलाद का एक टुकड़ा खाते हुए कहा!"इसका सबसे पहला वर्णन मिलता है ...
सभी गौर से सुन रहे थे! ये वो ज्ञान है, जो कहीं नहीं मिलता! जिसके पास है, बताता ही नहीं! छिपाकर रखता है! बताएगा तो कूट-भाषा में, समझ ही नहीं आएगा! सात्...
मैंने गिलास रखा नीचे, प्याज का एक टुकड़ा उठाया, चटनी से छुआ कर, मुंह में रख लिया! सभी मुझे ही देख रहे थे, हाँ, शर्मा जी का फ़ोन आया था, वो फ़ोन पर बातें ...
अब रौशन के अंदर जो था, वो सट्ट रह गया! ये क्या हो गया? वो उल्टा कैसे लटका दिया गया? उसकी बोलती बंद हो गयी! कंपकंपी छूट गयी! ऑंखें फाड़ फाड़ देखे! कभी नी...
"बता?" मैंने चिल्ला के पूछा!उसने लगाया ज़ोर! और एक टांग खेंच के मारनी चाही मुझे, लेकिन मार नहीं पाया! शर्म अजी ने बीच में ही रोक दिया, उसने शर्मा जी को...
महक ठीक वैसी ही होगी जैसे अभी हमें आई थी, तेज, भड़ाकेदार! गुलाब के अर्क़ जैसी, गुलाब के इत्र जैसी! लेकिन उस समय, रौशन को नहीं आई थी! इसकी वजह? क्या वजह ...
कुछ ही देर बाद, वो आ गया कमरे में! एक झोला लाया था अपने संग! झोला रखा उसने बिस्तर पर, बैठा और खोलने लगा! गुलाब की तज सी महक उठी उस लम्हे! बस, एक दो लम...
उस शाम मौसम के मिजाज़ कुछ बिगड़ से गए थे, रात में जब हम खा-पी कर फारिग हो गए थे, तब बाहर देखने पर, बादल से बनते दिखाई दिए, इसका मतलब था कि कल का दिन बेह...
