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"वधुका?" कहा मैंने,और झूमने लगा! वधुका ही अंतिम थी आमद में, तदोपरान्त, साधना पूर्ण हुई, माना जाता है! ये वधुका, स्वतंत्र, सिद्धिदायक एवम, मार्ग-प्रशस्...
सरणू जा बैठा तभी अलख पर, लिया अलख-भोग और झोंका मारा उसमे! क्रोध के मारे नथुने चौड़े हो चले थे उसके, चेहरे की मांस-पेशियां अकड़ चली थीं! ये ही तो दर्प है...
"हां साधिके?" कहा मैंने,"नाथ, उधर कोई है?" बोली वो,"कौन?" पूछा मैंने,"कोई है!" बोली वो, दोबारा!"देखो! और बताओ!" कहा मैंने,"ना....!" इस से पहले की वो प...
दो भिन्न सत्ताएं आदि बस प्रकट होने को थीं! ये प्रकटीकरण विशेष हुआ करता है! दुहित्र, त्रिपंश आदि मंत्रों द्वारा पोषित नेत्रों से ये देखा जा सकता है! पर...
वो लेटी हुई थी, और मैं अलख में ईंधन डाले जा रहा था, कुछ पल ऐसे ही शांत निकले, कुछ ही समय में, दूसरा प्रहर आधा बीत जाने वाला था!"हिल्लाज! अहो! अहो! अहो...
"साधिके?" कहा मैंने, फिर से!और उस बार भी कोई उत्तर नहीं! मुझे आदेश हो गया था उसी क्षण कि गुरुआयन की आमद हो ही चली है! अब उसके सेवकगण भी यहां उपस्थित ह...
अब साधिका को संग रखना, मेरी विवशता थी, अन्यथा, उसका अहित हो ही जाता! वैसे न ही सही, मारे भय और विस्मय के ही सही! अ थोड़ी सी रणनीति बदलनी पड़ी मुझे, मैंन...
"जी नाथ! अब नहीं!" बोली वो,जिस प्रकार से वो बैठी थी, मुझे पक्का यक़ीन था वो अवश्य ही ढुलक जायेगी उस पर से! इसीलिए मैं गया उसके पास, और उसको ठीक ढंग से ...
कुछ पलों तक, शान्ति पसरी रही! आज अंतिम रात्रि थी इस साधना की, अभी कुछ समय था हमारे पास! इसीलिए, तन्त्रोक्त विषय पर चर्चा चल रही थी, ऐसा अक्सर होता है!...
अभी मैं साधिका से बात ही कर रहा था कि अचानक से, गरम गरम रेत गिरने लगी नीचे! जैसे महीन सी मिट्टी! जैसी अक्सर नदी किनारों पर हुआ करती है, रेत सा! ये बेह...
"साधिके!" कहा मैंने,"नाथ?" बोली वो,"सागर कहाँ होता है?" पूछा मैंने,"जहां नदियां संगम कर, सागर से मिल जाती हैं!" बोली वो,"और ये नदियां क्या?'' पूछा मैं...
अब मैंने आह्वान आरम्भ किया! सामने रखा भोग-थाल सरका लिया था अपने पास! उसमे से कुछ मांस के टुकड़े ले लिए थे, एक एक मंत्र पर, एक एक टुकड़ा अलख में झोंके जा...
"हाँ, शाम्बूल!" बोली वो,"बताता हूँ!" कहा मैंने,और अलख में ईंधन झोंका, मैंने भी और उसने भी!"शाम्बूल एक स्थल है! एक स्थल, जहां पर, कुछ शक्तियों का वास ह...
उन दोनों के बीच बहस छिड़ गयी थी! इस सरणू को लगता था कि बालू नाथ मेरा अहित नहीं कर रहा! बल्कि, मुझे और मार्गदर्शन किये जा रहा है, इसीलिए उसने लगिली बोला...
तभी अचानक, मुझ पर कुछ छींटे से पड़े और मैं धड़ाम से नीचे गिरा! जब गिरा तो कुछ होश नहीं! मैं जैसे बेहोश हो गया था! न नेत्रों का ही पता, न किसी स्पर्श का ...
