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मैंने अविलम्ब पीछे देखा! हंसती सी, मुस्कुराती सी मेरी साधिका खड़ी थी! ठीक वही, जो मेरी ही थी! मेरी उसी भौतिकता वाली साधिका! ज्सिके संग में इस साधना में...
मैं उस लौ की तरफ बढ़ा और चला सामने की ओर, यहां भी सीढियां थीं, मैं आगे चलते हुए, उन पर चढ़ गया, ऊपर आया तो यहां फिर से दृश्य बदल गया था! मेरे सामने, दूर...
कुछ, करीब बीस मिनट बीते होंगे, कि मेरे त्रिशूल का फाल, मुझे अपनी गरदन पर चुभता सा महसूस हुआ, मेरी आंख्ने खुलीं, चेहरे को छू कर देखा, मेरा निचला जबड़ा स...
जैसे ही मैंने पीछे मुड़कर देखा, कि मुझे मेरी साधिका दीख पड़ी वहीँ खड़े हुए! वो जहां खड़ी थी, वो दृश्य बड़ा ही मनोरम सा था! कहने को यहां जल था, कुछ बड़ी, मोट...
मैंने लप्पझप्प में देख जोड़ी! देख जुडी, लड़ी और पकड़ी गयी! बाबा बालू नाथ तो, आँखें फाड़े, गहन मंत्रोच्चार करते जा रहे थे! अपनी भुजाओं से, रक्त निकाल निकाल...
"सोचा?" बोला वो,"हाँ!" कहा मैंने,"क्या?" पूछा उसने!"नही जाना!" कहा मैंने,तब वो हंस पड़ा!"आओ शाश्व!" बोला वो,और ले चला मुझे उस रास्ते से अलग! यहां, मानव...
करारी चालें चलने लगीं थी अब! क्या, कब, हो जाए, कुछ पता नहीं था! धुरंदर लड़ रहे थे! हम तो बस माध्यम ही थे! मात्र दर्शक के सिवाय और सन्धानक के अतिरिक्त, ...
आग! आग लगी थी मुझ में! आग, वो आग, जो या तो, खुद को जला दे या फूंक डाले मेरे प्रतिद्वंदी को! कपाल-शुंडी! जय माँ कपाल-शुंडिके! तेरा आशीष, सभी पर रहे! सर...
चटखीले लाल रंग और गहरे गुलाबी रंग के उसके परिधान सच में ही उसका वैभव दिखा रहा था! आभूषण ही आभूषण! जहां देखो, वहीँ आभूषण से युक्त थी वो स्त्री! मैं तो,...
जो आग, उस ढके हुए गड्ढे से भड़की थी, उसको तिमिषा कहा जाता है, ये क्रिया की अग्नि हुआ करती है! हमारी हिंदी, अपने ज्ञान, शब्द-कोष में, इतनी गहरी है कि सर...
मैं कंपकंपाता हुआ खड़ा हुआ! आसपास देखा! सारा स्थान एक जैसा ही था! मैं तो नितांत ही अकेला था! ठंड के मारे, और हालत खराब होने लगी थी! मेरे तंत्राभूषण आदि...
सरणू दौड़ कर गया! बैठा और अलख में भोग दे दिया! अलख तो जैसे अर्रा के पड़ी तब! तब तो अलख की ही माया होती है! अलख ही अलख! अलख में और भोग झोंका उसने! सप्त-स...
अभी कुछ ही समय बीत होगा, कहिये कि कोई तीन या चार मिनट ही, कि उसने एकदम से पासा पलट लिया! जो खिलाड़ी था, वो खिल्लड़ बन गया और जो 'भोग्या' थी वो, खिलंदड़ी!...
मैं, तुगेश्वेरी का आह्वान करना चाहता था! तुंगेश्वरी, तीसरी, शस्त्र-वाहिनि हैं श्री मातंगी की! ये तमोगुणी, प्रबल तामसिक एवं रक्षक हैं! श्री मातंग-महिमा...
ये समय बड़ा ही तीक्ष्ण था! पल में क्या हो जाए, पता नहीं! मित्रगण! जिस समय वधूके की आमद होती है, साधिका की 'सेज'(देह) को भोगने के लिए, न जाने कितनी ही अ...
