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तांगा अपनी गति से आगे बढ़ता चला जाता, और पीछे पीछे, उनके घोड़े, अपनी ही चाल में, आगे बढ़ते चले जाते! दोनों अपने अपने घोड़ों पर सवार हुए, आसपास के नज़ारों प...
वो घबरा रहा है, क्यों घबरा जाता है इसका कोई जवाब नहीं था उसके पास! जवाब था, तो दूर कहीं! जवाब, जो अभी तक भी नहीं पहुंचा था उसके पास! आँखों आँखों में ह...
अपनी उन्हीं यादो ने बसा हुआ, भाल चन्द्र, मुस्कुराहट के सतह, देखे जा रहा था, उस अनंतता की ओर जहाँ पूर्वी क्षितिज था! वहीँ था उसका वो दोस्त हाशिम! यही त...
आराम? क्या होता है आराम? किसे कहते हैं आराम? कैसे हो ये आराम? वो बाहर है अभी, कहाँ है? क्या आराम से है? कहाँ है हाशिम? क्या कर रहा होगा? किसके साथ होग...
बारह का समय होगा, आज सुबह से ही, जैसे धर-पकड़ सी मची थी! यहां जा, वहां जा, ये कर और वो कर, इसे से बात कर, और उस से बात न कर, ये ऐसे, और वो वैसे, ये यहा...
रात क़तरा क़तरा कटे जा रही थी, उस वक़्त, उस बियाबान ने, ग्यारह बजे होंगे! हर तरफ, आलम में, बस स्याह अँधेरा ही नुमाया था! दूर दूर तलक, जहां तलक देखो, अँधे...
फिर अचानक से उसमे फुर्ती दौड़ पड़ी! लौटा पीछे! आया उस रूपसी तक, देखा उसे गौर से, चेहरे पर जहां बेचैनी थी, वहीँ एक घबराहट सी भी उभरने लगी थी उसके! वो पीछ...
"अजी बाबा जी, बैठने का टाइम नहीं है!" बोले वो,अब सभी देखें उन्हें! कैसी जल्दबाजी है इन साहब को! आये हुए, सभी देखें उन्हें!"मामला गम्भीर है क्या?" पूछा...
तो हम एक ऐसी जगह आये, जहां से एक डगर, ऊपर के लिए चली जाती थी! यहीं से कुछ औरतें गुजर रही थीं, कुछ चढ़ भी रही थीं, ज़्यादा दूर नहीं, बांस गाड़ कर, कपड़े भी...
तो हम चल पड़े पेड़ के पास! यहां ऐसा तो कुछ नहीं था कि जैसे कोई बड़ा ही बाबा, अपने शिष्यों को कुछ सिखा रहा हो, पढ़ा रहा हो! यहां तो ऐसा लगता था कि जैसे अभी...
उस रात, महफ़िल सजी रही! खाना-पीना हुआ और फिर शहरयार जी भी वहीँ रुक गए! रात, देर तक, हम बातें करते रहे और फिर करीब बारह के आसपास नींद के झोंके आये, नींद...
और इस प्रकार से, क्रिया का, इस साधना का, अंतिम एवम महत्वपूर्ण चरण भी पूर्ण हो गया! मित्रगण! आयामों में विचरण करना, इतना सरल भी नहीं! समाधि की जिस उच्च...
नाचता जाऊं! झूमता जाऊं! बता किसी को नहीं पाऊं! गिर पडूँ! उठूं, तो फिर से गिर पडूँ! और फिर मैं हंसा! अपनी साधिका के सर पर हाथ फिराऊं, उसे चूमता रहूं! ऐ...
फिर मेरी आँखें झपकीं! और वो सब, सार्वभौमिकता लोप हो गयी! मैं तो अभी भी विचरण ही कर रहा था! हाँ, अब अँधेरा छंटने लगा था! कुछ कुछ अब दूर तलक, दीख पड़ने ल...
