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अब तो दिल का अमन-ओ-चैन जैसे उठ, खड़ा हो, बगलें झाँकने लगा था! ये मैंने क्या देखा था? या, मुझे क्या दिखाया गया था? किसने दिखाया था? हिरानु कहाँ थी? यहीं...
मैं दौड़ा हुआ गया उस पेड़ तक, सांस फूलकर, दुल्लर हो गयी थी, रास्ता ही ऐसा था, एक तो पथरीला और एक चढ़ाई! पसीनों के मारे हालत खराब थी, हलक सूख गया था, मैंन...
तो हमें चाय समाप्त कर ली थी, नींद भी पूरी हो गयी थी और थकावट भी नहीं थी अब! अब मेरा मन था कि इन दोनों जगहों के विषय में जाना जाए, बदकिस्मती से मेरे मो...
उसके बाद हम वापिस हुए! गरमी का तपता सूरज, अपने किरणें और पैना करता हुआ, हमारी पीठों पर धार लगा रहा था! ऐसी गरमी पड़ रही थी की अगर कोई नदी या तालाब मिलत...
अब हमें वहां से निकलना था, मंजिल थी, दूर कहीं उत्तर में चला जाए, वहीँ का अंदेशा था,और ऋतुवेश ने हमें जो दिखाया था, उसके अनुसार वो उत्तर दिशा में ही पड़...
कपडे लाये नहीं थे साथ, साथ था तो बस रुमाल और एक तौलिया! और कुछ नहीं! खैर, अब धर्मशाला तो ले ही ली थी, शर्मा जी ने अता-पता लिखवा ही दिया था! अब किया मै...
"सुनो?" कहा मैंने,"हाँ?" बोले वो,:समय क्या हुआ?" पूछा मैंने,"चार का समय है" बोले वो,"चलो!" बोला मैं,"कहाँ?" पूछा उन्होंने,"अभी चलो यार?" कहा मैंने,"कह...
"इसे यहीं बाँध दो वापिस!" कहा मैंने,''अभी लो!" बोले वो,बाँध दी उन्होंने वापिस वो पोटली, और आ गए मेरे पास!"अब क्या?'' पूछा उन्होंने,"रुको! रुको!" कहा म...
हम, उस बियाबान में अकेले ही खड़े थे! धूप चिलचिलाती हुई जैसे खालो को उतारने के लिए आमादा आन खड़ी हुई थी! न वहां कोई पेड़ था न कोई पौधा! धूप सीधी ही हम से ...
प्रकृति की गोद में बसा ये स्थान अत्यंत ही अनुपम था! वो शब्द कहाँ ये लाऊँ जिस से उस स्थान का बखान करूँ! न शब्द ही पर्याप्त हैं और न मेरी दृष्टि ही! ये ...
उस समय दिन के कोई दो या तीन ही बजे होंगे, या कुछ कम ही समय रहा होगा, यहां समय का पता ही नहीं चला रहा था, बाहर धूप खिली हुई थी, मनमोहक रौशनी थी बाहर, न...
"आइये!" बोला वो, और अपना कुछ सामान, जो कंधे पर लटकाया हुआ था, नीचे रख दिया उसने, एक तरफ! और हम चल पड़े उसके साथ ही! एक जगह से गुजरे तो एक बड़ी सी हाथ से...
और जैसे ही पीछे देखा हमने, हमारे तो होश उड़े! ऐसा तो हमने कहीं भी नहीं देखा था! ऐसा कैसे संभव था? वहाँ एक पेड़ लगा था, उसी पेड़ की शीर्ष से पानी की एक धा...
वो काजल ऐसा लगता था कि जैसे पिछली रात को ही बनाया गया हो, बनाया नहीं, खुद ही बन गया हो, उसमे चिपकीं वो फूलों की पत्तियां सूखी हुई थीं, मैंने कुछ पत्ति...
जहां मैं गया, वहाँ बस पत्थर, लकड़ियाँ, झाड़ियाँ ही थीं, और कुछ नहीं! बारिश ज़ोर पकड़ने लगी थी, मैं तो भीग ही चला था, हवा चलती तो हलकी फुरफुरी सी भी दौड़ उठ...
