Last seen: May 5, 2026
बारिश ने सांस ली! और रुकी थोड़ी देर के लिए! मौसम सुहावना हो गया था फिलहाल में तो! ज़मीन इतनी भी गीली नहीं हुई थी कि कीचड़-काचड़ हो, जो पानी पड़ा था, वो ज़मी...
और फिर बजे साढ़े सात! यूँ कहिये, कि अब बिसात बिछ गई और हम, इस खेल में शरीक़ हो गए! अब सबसे पहला काम यही था, कि उन तीनों को उस कमरे में रखा जाए, और वैसे ...
रात भर नींद नहीं आई चैन से! कभी इस करवट, कभी उस करवट! कभी आँखें खुल जाएँ, कभी खोलनी पड़ें! कम से कम पांच बार तो पानी पी लिया! हालांकि मौसम बढ़िया हो गया...
"जी, यही बोल रहा था बिल्ला साईं!" बोले प्यारे लाल जी!"सही बोल रहा था, कोई शक नहीं!" कहा मैंने,"तो क्या कुल चौबीस हैं वे सब प्रेत?" बोले वो,"अब क्या पत...
करीब, पचास मिनट बाद, शहरयार जी का फ़ोन बजा, ये बाबा खचेडू का ही था, अब उनसे बातें हुईं, कुल दस मिनट तक, कोई ख़ास जानकारी हाथ नहीं लगी, किसी ने भी इस समु...
हम आगे चले, एक बड़ा सा कट्ठे का पेड़ लगा था वहां! उस पर, हल्के पीले से छोटे जंगली शहतूत लगे थे, कुछ बालक, उच्च-उचक कर तोड़ रहे थे उन्हें, कुछ उसकी डालिया...
तो गाड़ी हमारी भागम-भाग भागे जा रही थी! कोई ढाई किलोमीटर चलने पर, एक रास्ता दिखाई दिया, ये एक नहर सी थी, अब पानी नहीं था उसमे, नहर थी या कोई बरसाती नाल...
ये खाल तो ऐसे खींच दी गई थी कि जैसे, किसी के पांवों को तोड़ कर, उस पर खड़ा हुआ हो कोई, और पूरी जान लगाकर, सर तक, खींच मारी हो! अभी तक उस खाल पर, मक्खिया...
"सुनो?" बोला मैं,"जी?" उनोने, धीरे से कहा,"यहां, अचानक से हर वस्तु ज़िंदा हो गई है, मेरा आशय है, मेरे इशारे समझना..." कहा मैंने,"हुक़्म!" बोले वो,"चालै?...
ऐसी धूल उठती थी कि सामने का दृश्य ही गायब हो जाए! कभी-कभार तो रुकना भी पड़ता था! बारिश की तलबग़ार थी वो ज़मीन! प्यासी और रूखी! बारिश आये तो जाकर, शांत हो...
इंदरगढ़! एक खूबसूरत जगह! उसने तो देखते ही मन मोह लिया मेरा! पुराना और ऐतिहासिक स्थल! आज भी शान से खड़ा है इंदरगढ़ का शानदार किला! अपनी विरासत का बखान करत...
जहां वे पेड़ लगे थे, और जहाँ से ये आवाज़ आ रही थी, या हमें आती सुनाई दे रही थी, एक ऊँची सी जगह पर थी, हम, दोपहर के वक़्त यहां से गुजरे थे, कुछ असमान्य नह...
मैं बैठा रहा वहीँ, शर्मा जी नींद के आगोश में चले गए थे फिर से, उनके खर्राटे गूंजने लगे थे, लेकिन मैं कहीं और ही खोया था, सोच रहा था कि, दिन, रोज हो हो...
वे अभी बाहर ही थे, और मैं अंदर चला आया था! आते ही, एक घोर आश्चर्य से सामना हुआ था! और आश्चर्य ये, कि वो जो पत्थर, हमने निकलवाया था, उसके तीन टुकड़े हो ...
भोजन कर लिया था, अब हुए वापिस, पानी खरीद लिया था, धर्मशाला का पानी ठंडा नहीं था और फिर खारा भी बहुत था, गर्मियों में सबसे बड़ी चीज़ ये पानी ही होता है, ...
