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हम उस जगह आन पहुंचे, जहां कुछ क्षणों ही पहले, ऋतुवेश और हिरानु मौजूद थे, वे संभवतः मार्ग-प्रशस्ति हेतु वहां प्रकट हुए थे, यही से वो मार्ग ऊपर टीले तक ...
सामने दो या तीन शव पड़े थे, कटे हुए, रक्त से नहाये हुए, पहचानना मुश्किल था कि कभी देखा भी था हमने उन्हें, हम आगे गए, तो ये तीनों ही शव किशोरों के थे, द...
हम दौड़ लिए आगे की तरफ! भागते जा रहे थे! दोपा यहां पहुँच चुका था, ज़मीन में, निशान बने थे ऊंटों के खुरों के, एक दूसरे को काटते हुए! वे सब, उस हत्याकांड ...
ओट से देखा, तो कुछ दिखा, कुछ ऊँट खड़े थे ऊपर की तरफ, दोनों ही ढलानों पर, एक एक ऊँट पर, हथियारबंद से औघड़ बैठे हुए थे, सभी नग्न और खतरनाक! वे एक एक करके ...
मैंने पत्थर फेंका! खड़ा हुआ, और चौंक कर आसपास देखा, मुझे एक जगह करीब छह गज पीछे, शर्मा जी की कमीज दिखी, मैं भागा उनके पास, वे पेट के बल लेटे हुए थे, चे...
अंदर आये तो, जैसे हम पृथ्वी पर नहीं थे! एक एक वस्तु वहाँ चमक रही थी! सफेद दूधिया रंग की हो चली थी एक एक वस्तु! क्या फूस, क्या शहतीर, क्या वो भूमि, क्य...
एक लोक-गीत सा गूँज रहा था वहां! मद्धम मद्धम सा! हालांकि एक शब्द भी नहीं जाना जा रहा था, न समझ में ही आ रहा था, पर था कोई लोक-गीत ही वो! कई स्त्रियां ज...
ये सोमा की लता थी, इसमें एक खासियत हुआ करती है, मध्यान्ह तक ये लता सुबह की ओंस अथवा नमी को, अपने अंदर समा कर रखा करती है! इसमें इतना पानी तो मिल ही जा...
"हाँ, इतना तो होगा ही!" कहा मैंने, "आओ यार, आगे चलें!" बोले वो,"हाँ, जल्दी चलो!" कहा मैंने,और हम, वहां उस जगह से दूर चलने लगे, रास्ता सामने ही था,...
वो द्वार कम और गुफा सी अधिक लगती थी, हाँ, बस इतना कि गुफा को बनाया गया था, कृत्रिम थी वो गुफा! वहाँ से देखने में, अंदर घुप्प सा अँधेरा दिखाई देता था, ...
जल पी लिया था हमने, पात्र वापिस रख दिए थे, जल में मिट्टी के महक समायी थी, जल ऐसा ताज़ा था कि सारी थकान ही काफ़ूर हो चली थी! हिरानु ने वे पात्र उठा लिए थ...
हम सीढ़ियां उतर गए थे, मैंने सर उठा कर देखा, सूर्य पीठ पीछे थे, अर्थात अभी समय करीब दस या साढ़े दस का रहा होगा, वहां की दिनचर्या आरम्भ हो गयी थी! सभी जन...
हम आगे बढ़ते गए, मंदिर बड़ा ही साफ़-सुथरा और अंदर से भी लाल ही था! देखने में तो एकदम नया सा लगता था मंदिर, जैसे हाल-फिलहाल में ही निर्माण हुआ हो उसका! प्...
हम आगे चलते चले गए, अब खंडहर कहाँ थे, पता नहीं चला रहा था, हम घूम कहाँ रहे थे, ये भी नहीं पता चला रहा था! किस दिशा में थे, इसका भी भान नहीं था, कम से ...
बाबा खेमू! काल का परकाला! अनगिनत लोगों का हन्ता! उसका रूप ही उग्र-चांडाल सा था, सच में, कोई साक्षात देख ले, तो आत्मा अंदर तक काँप के रह जाए उसकी! एक ब...
