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जैसे ही मैंने वो पुड़िया फाड़ी कि वे पाँचों, ठीक उसी समय, लोप हो लिए! मेरा सन्देशा उन्हें मिल ही चुका था! वे समझ ही चुके थे कि अब मैं वहां से हटने वाला ...
हमने आसपास के स्थान का अवलोकन किया, विशेष तो कुछ भी नहीं था वहां, न ही कोई विशेष ही पत्थर, न कोई चबूतरा और न ही ऐसा कुछ कि जिस से पता चल सके कि यहां प...
"लेकिन सवाल अभी भी वही है!" कहा मैंने,"क्या?'' बोले वो,"यही कि एक महा-साधक को धन से क्या काम?'' कहा मैंने,"हाँ, यहां तो धन ही धन है!" बोले वो,"वही तो!...
तो अब हम नीचे उतर आये, नीचे जो चरवाहे थे, वो आगे जा चुके थे अपने मवेशियों को हांकते हुए, बाबा और महेश वहीँ बैठे हुए थे एक जगह, कुछ मंत्रणा सी कर रहे थ...
चाय पी ही ली थी, और मन में अब कुछ नए से सवाल थे, इनका निराकरण आवश्यक था! तो मैं, उन दोनों को वहीँ छोड़, वापिस उस बैठक में आया, बाबा, महेश और शर्मा जी, ...
"हाँ, सीध में!" कहा मैंने,"बिलकुल!" बोले वो,और हम, उस सीध में, दायीं तरफ, काफी आगे तक चले आये, लेकिन वहां हमें कोई निकास या कोई निर्माण या खंडहर न मिल...
"नीचे तो अँधेरा है घुप्प?" बोले वो,"देखना तो होगा?" कहा मैंने,"टोर्च भी नहीं लाये?" बोले वो,"एक मिनट, सोचने दो!" कहा मैंने,"जी" बोले वो,"एक काम किया ज...
"इसके पीछे?'' बोले वो,"हाँ, अब मौक़ा न चूकें हम!" कहा मैंने,"चालै!! हिड्ड-हिड्ड! चालै!" वो कहते कहते रुका, हम भी रुक गए, उसे फिर जैसे कुछ याद आया, सर प...
माथे पर लाल टीका और गले में सफेद फूलों की माला! ऐसा मात्र एक ही है जो करता है और वो है एक ब्रह्म-पिशाच! ब्रह्म-पिशाच एवं ब्रह्म-राक्षस, यूँ तो समकक्ष ...
"चालै! हाँ!" बोला वो, फिर से दीवार की तरफ इशारा करते हुए!"कौन?" पूछा मैंने,"मांगल!" बोला वो,"कौन मांगल?" पूछा मैंने,"मांगल! मांगल, चालै!" बोला फिर से ...
और फिर, अंदर आई गोमती! अपनी आँखों में आंसू लिए, संग रुपी भी, उसका हाथ थामे, वो उसकी अन्तःकरण से सखी थी, ये मैंने देख लिया था! दोनों में, बहनों से भी ज़...
तो हम उस प्रांगण में आ गए थे, यहां एक लालटेन जल रही थी, लालटेन नहीं कहूँगा उसे, दरअसल, वो केरोसिन-आयल का लैंप था, जिसका शीशा अब टूट गया था, तो बाती उस...
अब तक मैं भी नीचे पहुँच चुका था, उस जगह पहुँचते ही मैंने मिट्टी के रंग में बदलाव देखा, यहां ये पीले रंग की सी हो गई थी, नहीं तो हर जगह ये धूसर रंग की ...
तो हम, अब आगे बढ़ चले थे, इस जगह की सुंदरता को शब्दों में बांधना ठीक वैसा ही है, जैसे सागर को किसी मृद-भांड में समाहित करना! इस न केवल असम्भव ही है, अप...
"वही तो?" बोले वो,"ये मूर्ति, इस हंडिया में, सम्भाल कर रखी गई, इस बीजक के नीचे, क्यों?" पूछा मैंने,"पता नहीं!" बोले वो,"सोचो, मूर्ति रखने वाला क्या चा...
