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हाँ तो रचिता ने आँखें मूंद ली थीं! उसके बदन में जैसे सर्द हवाओं ने, कई सूराख़ बना, एक अजब सी मदहोशी सी भर दी थी! देह में, अंगड़ाई जैसे, कहीं फंसी हुई थी...
"अच्छा लड़का है!" बोला बाबा,"हाँ!" बोली माँ,"क्या करता है?" पूछा बाबा ने,"पढ़ रहा है अभी!" बोले पिता जी,"जय तारकेश्वर!" बोला बाबा,"बाबा सब ठीक?" पूछा पि...
इस तरह से, सभी तैयारियां हो गईं! अशोक जी के बड़ी गाड़ी में, सभी आ ही गए! रचिता और नितिन, पीछे जा बैठे थे, रचिता को बाहर झाँकने की आदत थी, नितिन उसको टोक...
पीछे से अजीब सी आवाज़ हुई! मैं मुड़ा उधर के लिए! देखा, टोर्च की रौशनी डाली! कुछ नहीं था! हाँ, आवाज़ ऐसी थी, जैसे कोई भारी सी लोहे की ज़ंजीर खींची गयी हो! ...
तो उसी शाम बात हुई पिता जी से, रचिता तैयार थी, घुमक्कड़ तो थी ही, घूमना बेहद पसंद था उसे! और फिर ठहरी अपने पापा की लाड़ली! और पापा भी, सबसे पहले अपनी गु...
फोन बजा तो उसने उठाया, नंबर पहचान गई थी, ये नंबर अंजू का था! अंजू ने उसको खुशखबरी दी थी, कि अंजू पेट से है, और डॉक्टर ने इस बात की पुष्टि कर दी थी! पह...
बज गए साहब दस! कोई आवाज़ नहीं! कोई आमद नहीं! सुनसान और बियाबान! उसके बीच, हम चार इंसान! सड़क का यातायात अब बढ़ता जा रहा था, रात का समय था, इसी समय बड़े बड़...
"क्यों नहीं बुलाएंगे आपको भला?" बोली वो,"बुलाएंगे तो आउंगी!" बोली रचिता!"अच्छा है, हमें अच्छा लगा!" बोली वो,"सच में?'' पूछा रचिता ने,"हाँ, सच में!" बो...
वे आगे गए, और प्रांगण में आ गए उस मंदिर की! तभी एक नारा गूंजा, तारकेश्वर महादेव की जय! अब आया समझा कि ये कोई मंदिर है, तारकेश्वर महादेव का मंदिर! मंदि...
चाय भी पी ली! दूध भी करीब आधे घंटे बाद, ज़बरदस्ती ही पिला दिया गया एक तरह से! भोजन तो अब किया नहीं जा सकता था, पेट लबालब भरा पड़ा था! तो जी, फिर आराम ही...
बाबा जैसे ही झुका, उसका हाथ जैसे किसी ने पकड़ लिया, पहले सामने की तरफ खींचा, बाबा की तो आँखें ही चढ़ गईं! हाथ की हड्डियां तलक टूट गईं, चटकने की आवाज़ सभी...
"कहाँ?" बोली रचिता!"वो देखो न?" कहा उस लड़की ने, इशारा करते हुए सामने!"मुझे तो दिख नहीं रहा कुछ?" बोली रचिता!"इधर आओ!" बोली वो,रचिता ने जगह बदल ली अपनी...
"ऐसी न जाने कितनी इमारतें हैं, अभी भी, जो कभी रौशन थीं, जहां, कोई साधारण व्यक्ति पाँव भी नहीं फटक सकता था, आज तरस रही हैं अपनी कहानी बनाते को!" कहा मै...
माँ ने दरवाज़ा बंद किया था, और चल पड़ीं थीं, अपने कमरे की तरफ! पिता जी, वहीँ बैठे थे, कुछ कागज़ वगैरह, देख रहे थे, ये सब, उन मरहूमात के काम के कागज़ थे, स...
खैर जी, घर पहुंची वो, स्कूटी खड़ी की घर में ही, सामान निकाल लिया बाहर! और चल पड़ी अंदर, बाहर, गाड़ी खड़ी थी पिता जी की, वे आ चुके थे, देर ना की, लपक कर अं...
