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और फिर रोहतास ने, अपने नीचे बिछी हुई दरी के ऊपर बिछे हुए उस कपड़े के नीचे से, तीन धागे निकाले, धागे, भस्म में रगड़े, और उनमे, सात सात गांठें बाँध दीं! ह...
प्रेत लोप हो गए थे! समय बड़ी ही तेजी से भागे जा रहा था आगे! और ये, अपने आपको हाज़िर नहीं कर रहा था! न जाने क्या कारण था! शायद, मुझे भी तोल रहा हो वो, जै...
कुछ समझी नहीं रचिता! कैसी नज़रें, क्या हक़ीक़त और क्या सामने? "जागो! और जानो!" बोली वो लड़की!और अगले ही लम्हे, नींद खुल गई उसकी! अपने आसपास देखा उसने, ये ...
"बहुत छका लिया इसने!" कहा मैंने,'हाँ ये तो है!" बोले वो,"क्या करें?" पूछा मैंने,"कोई जंतर भिड़ाओ अब!" बोले वो,"कल ही सम्भव है!" कहा मैंने,''सामान चाहिए...
कुछ देर तक हम, बैठे ही रहे! बाहर झांकते रहे! यातायात, छिटपुट ही था! शनिवार का दिन था और शायद ऐसा ही रहता हो, ये बस मेरा ही अंदाजा था!"अब क्या करना है?...
तभी मुझे फिर से हुलारा सुनाई देने लगा! इस बार हुलारा जो गाया जा रहा था, उसमे इस बार, ढामरी बज रही थी! ढामरी मायने, एक बड़ा सा तवा! जिसे लोहे के मूसल से...
इसका मतलब, इस हुलारे में, उन पच्चीस आदमियों में, अवश्य ही कोई संबंध है! लेकिन सवाल ये, अहम, कि ये पच्चीस आदमी हैं कौन? क्या ये प्रेत हैं? या फिर वैसी ...
मित्रगण! रात्रि में दो ही हुलारे बजाए, गाये जाते हैं! एक श्री महा काली का और एक श्री महा काली के लाल का! काशी के कोतवाल का! अर्थात श्री भैरव नाथ जी का...
"आइये तो?" बोली वो लड़की!"तुम तो तेज हो बहुत!" बोली रचिता, साँसें सम्भालते हुए!हंस पड़ी वो लड़की! खिलखिलाती हंसी, बेहद ही प्यारी सी!"नाम नहीं बताया तुमने...
इस तरह माँ और बेटी में आपसी गुफ़्त-गू आगे बढ़ती रही! रचिता माँ को जैसे जानबूझकर तंग कर तंग किये जा रही थी! माँ कुछ कहती, गुस्से में, तो रचिता हंसकर टाल ...
"कौन हो तुम? क्या तुम ही ये हुलारा गा रहे हो?" पूछा मैंने,खार! खार! खार! खार!ऐसी आवाज़ें मेरे कानों में आयीं! मैं जानता था इसका मतलब! मतलब हाँ! हाँ, ये...
तो, कॉफ़ी लेने वालों ने कॉफ़ी ली, चाय वालों ने चाय और शीतल-पेय लेने वालों ने शीतल-पेय! साथ में कुछ चिप्स आदि भी ले लिए थे! कुल पच्चीस-तीस मिनट लग गए हों...
रचिता ने क्या देखा? यही तो मैं भी सुनना जानना चाहता था! मैं भी ठीक वैसे ही बेचैन था, जैसे, उस लम्हे, कुछ देख, रचिता भी हुई थी! आखिर क्या देखा था उसने?...
हम आ गए वहां! आसपास देखा! मनोज नहीं था वहां! सड़क पर जाकर देखा, वहां भी नहीं! दायें, बाएं, आगे, पीछे, हर तरफ! कहीं नहीं!"कहाँ चला गया ये?" बोले वो,"रुक...
रात का सवा बज चुका था और हम अभी तक कुछ भी पता न लगा सके थे! हाँ, इतंना कि इस शय की माया देख चुके थे! माया में तो सामर्थ्य रखता था ये, ये जो कोई भी था!...
