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कोई भी औघड़!अपना त्रिशूल नहीं फेंकता शत्रु के दायरे में!लेकिन बाबा जागड़ ने फेंका था!और कोई शत्रु,त्रिशूल वापिस नहीं करता,लेकिन मैंने किया था!क्यों?ये थ...
तब एक चुटकी में,मेरा मस्तक धड़ से अलग कर दें!"आगे बढ़ बेटा!" बोला जागड़!"बाबा?" मैंने कहा,"हाँ द्वैपा?" वो बोला,"ये सब क्या है?" मैंने पूछा,"मत पूछ! आगे ...
"वाह द्वैपा! आनंद!" वो बोला,और तब उसने त्रिशूल उठाया अपना!और फेंक मारा मेरे सामने!स्वर्ण से बना वो त्रिशूल,मेरे सामने आ गड़ा!ये क्या?मैं उठा!त्रिशूल खी...
मैंने खंजर लिया,और अपने शरीर में,नौ जगह चीरे लगाए,छोटे छोटे,और फिर विद्या चलायी,दो टुकड़े अलख में फेंकते हुए!बाबा जागड़ के शरीर से,उन्ही नौ जगह से,रक्त ...
शाबाश द्वैपा!वो किसलिए?क्यों?बस यहीं अटका रहा था मुझे,ये बाबा जागड़!क्या कहूँ इसे?प्रतिद्वंदी की प्रशंसा?या कोई चाल?या कोई,प्राचीन विधा?क्या था ये?क्यो...
जैसे मुक्त हो गया होऊं,किसी अँधेरे से भरे,छोटे से डिब्बे से!अब मुझे क्रोध आया!मैंने जामिश-विद्या का संधान किया,एक चिन्ह बनाया,और उस पर,कुछ मांस के टुक...
अपना फन चौड़ा कर के!और मारी फुंकार!उसने वहाँ मारी फुंकार,और यहां मेरे शरीर में,आग सी लगी!लगा,सैंकड़ों सर्पों ने,दंश मारा हो!मैंने फ़ौरन ही,सर्प-विमोचिनी ...
कभी कल्पना भी नहीं की थी!इसका एक ही अर्थ था,कि धौत्य-पुत्री भी सिद्ध थी,बाबा जागड़ से!अर्थात,सर्प-विद्या में ऐसा कुछ भी नहीं,जो बाबा जागड़ न जानता हो!"द...
और मैं क्या देखता हूँ!वो ध्रुव-मीणा,अपनी नाग कुमारियों संग,वहीँ थी!और उनके बीच,खड़ी थी,वि धौत्य-पुत्री!सांप सूंघ गया मुझे तो!जड़ हो गया मैं!जान निकल गयी...
नीचे तक आते हुए,जैसे ही भूमि से स्पर्श हुआ,घड़ियाल बजने लगे!मैं खड़ा हुआ!सुगंध फ़ैल गयी!धौत्य-पुत्री प्रकट होने वाली थी!दो नाग-शक्तियां,अब प्रकट होने को ...
कामरूप की रौद्र सेविका?नाग-वंशी?बाबा जागड़ के पास?क्या है ये बाबा जागड़?बाबा जागड़ ने,अब आह्वान आरंभ किया!अलख में ईंधन झोंका!और महा-मंत्र पढ़ने आरम्भ किये...
कर्ण-पिशाचिनी कुन्द!दोनों ही शांत हो गए!मेरी जैसे भुजाएं कट गयीं!अब घबराहट हुई मुझे!पहली बार तेज तेज दिल धड़का!तभी वो कटा सर,उछल कर,मेरी गोद में आ गया!...
ये तो,कोई नाटक सा चल रहा था!वो मुझे प्रेरित कर रहा था!बार बार!अब उसने सुलपा जलाया!दमदार दो घूँट खींचे!और रख दिया कपाल के सर पर!"चल! देर भली नहीं!" वो ...
उड़ा दिया उसने उसे!चूमते हुए!मैं धक्!ये क्या?बाबा जागड़,सब जानता था?कैसे?कैसे भेदा उसने मेरी उस उलूक-पूजन को?असम्भव! "चल द्वैपा! खड़ा न रह! आगे बढ़!" जा...
कान के परदे फटने लगे!और तभी,वो गड्ढे,और कुँए,भरने आरम्भ हो गए!और धीरे धीरे,सारे पट गए!भयानक माया रची थी बाबा जागड़ ने!ऐसी प्रबल माया तो,मैंने डाकिनियों...
