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"द्वैपा! मैं जागड़ हूँ! मिट्टी तेरी तरह!" उसने कहा,"नहीं बाबा! मेरी तरह नहीं! मैं तो आपके पांवों का धोवन भी नहीं!" मैंने कहा,और रो पड़ा!बहुत तेज!सिसकिया...
लोप कर दिया?कौन हो तुम बाबा जागड़?कौन हो तुम?इस मानव देह में कौन हो तुम?अब पहेलियाँ न बुझाओ!मेरा मस्तिष्क फट जाएगा!मैं पागल हो जाऊँगा!मैं मर जाऊँगा!प्र...
औघड़ था!प्रबल औघड़!केतकी का आह्वान करने में,कोई आधा घंटा लगा!और फिर,ब्रह्म-पुष्प की,बरसात हुई!वातावरण सुगन्धित हुआ!और श्वेत रूप में केतकी,प्रकट हो गयी!म...
श्मशान पर नज़र डाली मैंने,जहां,वे सब ठहरे थे,वहाँ नज़र डाली,वो रास्ता,जो जाता था मुख्य-स्थान को,आज बहुत बड़ा हो गया था!मीलों बड़ा!"चल द्वैपा! दो प्रहर गए!...
जितना समय मैं सोचने में लगाता,उतने में तो वार हो जाता था!"वाह द्वैपा वाह!" बोला जागड़! "चल द्वैपा! चल बेटे! आगे बढ़! मत रुक! रुकना नहीं है! आगे बढ़!" ब...
"ले!" फिर से आवाज़ आई!भूमि हिली!फटी!और उसमे से,जलते हुए कोयले दिखे!तपते हुए पत्थर!भीषण ताप!और जो उसकी भाप थी,वो मुझे अंदर खींचे जा रही थी!मेरी वस्तुएं ...
बड़ा अजीब सा सवाल था!सीने को चीर दिया इस सवाल ने!फिर सोचा,जब मरणा ही है,तो क्यों न लड़कर मरा जाए!ऐसे काहे निरीह बना जाए?"घुटने टेक दिए?" उसने पूछा,"नहीं...
तो उसी को सिद्ध करता मैं!अफ़सोस!ऐसी कोई सिद्धि नहीं!"आगे बढ़ द्वैपा?" उसने कहा,अब नहीं बढ़ सकता था!चाह कर भी नहीं!कुछ नहीं कर सकता था!बाबा जागड़,तुम जीत ग...
मेरे यहां आते ही,नभ में,लोप हो गयी!अब हुआ मैं ढेर!मैं बैठ गया!अपने हाथ अपने घुटनों पर रख कर!एक हारा हुआ खिलाड़ी!एक हारा हुआ जुआरी!ठीक वैसा ही!दांव हार ...
और शत्रु-भेदन में,ये अपने साधक की,हर क्षण रक्षा करती है!ब्रह्म-कपालि प्रकट हुई!और मैं दंडवत लेट गया!भोग आगे किया,और एक उद्देश्य मंत्र पढ़ा!उड़ चली ब्रह्...
कपाल फूटने लगे!अस्थियां,राख होने लगीं!ढेरियां बन गयीं उनकी!वो सभी आकृतियाँ,अब मूर्त रूप लेने लगीं!ये सभी उप-सहोदरियां हैं इसकी!ये ब्रह्म-कपालि,आज भी प...
तो अंट-शंट बकने लगा!"द्वैपा! आगे बढ़!" आवाज़ आई बाबा जागड़ की!बाबा जागड़,अपनी व्याघ्र-चर्म को,पोंछ रहा था!मुझे देखा!और अट्ठहास किया!मेरा उपहास किया उसने!म...
मैंने फिर से आह्वान किया!और इस बार न भेदा उसने!बीस मिनट में,शैल-त्रिजा का आह्वान करते करते,मैं खो सा गया!और तभी!गहरा भूरा प्रकाश कौंधा!पत्थरों की बरसा...
सांप सूंघ गया!वो महा-शक्ति,जिसने मुझे कभी धोखा नहीं दिया,प्रकट ही न हुई!अब तो जैसे,मेरा चीखने को मन हुआ!चिल्लाने को!भय बस गया मेरे अंदर!खाली होने का भ...
मैंने फ़ौरन ही,अपना त्रिशूल उठाया,और एक मंत्र पढ़ा!मेरे मुंह में,रक्त भर आया!गाल फूल गए!इतना रक्त,कि,नाक से भी बहने लगा!अब न रहा गया,मैंने कुल्ला कर दिय...
