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आज नींद सच में बहुत दूर खड़ी थी! आज गंतव्य भूल गयी थी! इथि को तो कम से कम भुला ही दिया था आज! इथि! क्या करे? कोई जवाब भी तो हो? जवाब तो चलो...
ये क्या? चन्द्र भी हंस रहे हैं खिड़की के बाहर से! किस पर? मेरी निंदिया पर? मेरी खीझ पर? नहीं! नहीं नहीं! मेरी उलझन पर! हाँ! उलझन पर! ...
आज तो न भूख थी और न प्यास! प्रीत की अलख जिसे एक बार झुलसा जाए उसके लिए क्या भूख-प्यास! यही हुआ इथि के साथ! प्रीत का नन्हा सा कोंपल झाँकने लगा यौवन...
वो अनमने मन से उठी, कोने से अनाज उठाया और फिर छाज, बेमन से अनाज फटकारने लगी! माँ अंदर आयी, तो देखा अनाज फटकारना भूल गयी है इथि! “क्या हुआ?” माँ ने...
“क्या हुआ?” माँ ने पास बैठते हुए पूछा, “कुछ नहीं” उसने कहा, “तबियत खराब है क्या?” मैंने ने फिर पूछा, “नहीं” उसने उत्तर दिया, ‘फिर क्या बात है?...
शीघ्रता से! कैसे आये? बहुत समय शेष है! कुछ कहने सुनने का मन न करे! कहीं जाने का मन न करे! खाने पीने की सुधबुध ख़तम! बस उलझन! और उलझती चली...
वापिस गाँव की ओर! सभी अपने अपने कल्पिनीय क्षेत्र में उलझी हुईं! लेकिन इथि! इथि तो न केवल उलझी थी, बल्कि भटक भी गयी थी! कोई मानस ऐसा सुंदर भी ह...
जब नहीं हटी वो तो विपुल ही उसकी दूसरी तरफ से निकल गया! और दोनों बतियाते चल दिए अपनी राह! इधर उलझन में उलझी हुई इथि देखती रही! निहारती रही! प्रतिबिम्...
रह गयी इथि! अकेली इथि! वे आते गए सामने! इथि न हटी वहाँ से! कैसे हटती! वो रुकी ही कब थी! उसको तो रोक दिया गया था! किसी के लावण्य ने रोक द...
वे दोनों उतर गए तालाब में! जल-क्रीड़ा! किसी से नहीं रुका गया! वे सभी मंत्र-मुग्ध सी चल पड़ीं उनके पीछे पीछे तालाब तक! तालाब में स्वछन्द तैरते गा...
उन्होंने जो रूप धरा ऐसे मानस तो कभी किसी ने नहीं देखे थे! साक्षात देव-प्रतिमा! अब वे क्या जानें! रूप धर लिया! वे दोनों चले अब आगे! तालाब की तरफ!...
मछलियां श्वेत हो जाती हैं, उन पर सुनहरे रंग के बड़े छोटे बिंदु उभर जाते हैं! चीन में ऐसे कई तालाब हैं, जहां ऐसा होता आ रहा है आज भी! तभी कुछ हंसी की ...
सभी के साथ! जब पृथ्वी पर बसंत का समय होता है तब गांधर्व पृथ्वी का रुख करते हैं! पृथ्वी पर वास करते हैं, शिखरों पर, वन में, कंदराओं में और तालाब के आ...
ये घटना आज से कोई पौने दो सौ वर्ष पहले घटी थी! खूबसूरत जंगली क्षेत्र! गोरखपुर! भारत के नेपाल सीमा की बीच का क्षेत्र! जहां आज सोनौली है, वहीँ से ...
वो कंबलों की तह करके रख रहा था! “ले आ?” मैंने फिर से कहा, सुस्ताया सा बाहर जाने लगा! और फिर थोड़ी देर में चाय ले आया! हम चाय के घूँट भरने लगे! ...
