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ये कहानी थी,इसके अवशेष थे!कहानी कुछ यूँ है,मेरे शब्दों में,इस गाँव में,जहां आज भास्कर परिवार रहा करता है,यहीं करीब डेढ़ सौ साल पहले,एक मौलाना हफ़ीज़ साहब...
मैं भोग आदि लेकर,और वो,पोटली लेकर,चल पड़ा अपने,क्रिया कक्ष में!लप्प-झप्प में,अपना आसन बिछाया!और अलख उठा दी!समस्त नमन किये!भोग-थाल सजाये,दीप जलाये!और कर...
और फंस गए हम!अब,बेचैनी साथ ही न छोड़े!उस रात क्रिया नहीं की जा सकती थी,क्रिया,दो दिन बाद ही की,जा सकती थी!और ये दो दिन,और एक रात!मानों,जैसे कई साल के ब...
जस का तस!आज निकलना था यहां से!हम नहाये-धोये,निवृत हुए,चाय नाश्ता किया,उसके बाद,थोड़ी देर बाद,किया भोजन,और फिर कुछ आराम!जल्दी पड़ी थी बहुत!कब निकलें यहां...
मेरी ही,कोई अपनी!वो मौलाना साहब,बाप थे उस लड़की के,एक बाप पर क्या गुजरी होगी,मन उदास हो गया बहुत!शर्मा जी भी,गहरी सोच में डूब गए!न जाने क्या क्या,होता ...
और ये हलकारा,बेचारा,क्यों नहीं पहुँच सका?क्या वजह हुई?दिल में,कांटे चुभ गए!इतिहास,सब छिपाए हुए था!अपने परदे के पीछे!बहुत कुछ था इसके पीछे,और अब!ये पर्...
शाह साहब के बेटों को,पढ़ाई करायी थी मौलाना साहब ने,और अब बेटी के ब्याह के उस मौके पर,शाह साहब ने,मौलाना साहब के लिए,ये मदद भेजी थी,मैंने,पोटली खोली,इसम...
लेकिन इसको खोलना ज़रूरी था,ताकि,आगे का रास्ता खुले,अब मैंने वो रस्सी खोली,रस्सी खुली,फिर दूसरी रस्सी खोली,पहली,लाल रंग की थी,दूसरी काले रंग की,दूसरी भी...
मैं, शर्मा जी और भास्कर साहब,और वो अनुज,साँसें थामे देख रहे थे!ऐसा सामान मैंने पहले भी देखा था,एक बार,मुरादाबाद में,ऐसे ही एक प्रेत ने,मुझे एक पोटली द...
और चला गया,दूर अँधेरे में!अब हम अंदर आये,वो पोटली देखी,चमकदार थी,सुनहरी सी!काफी भारी थी!न जाने क्या बंधा था उसमे!मैंने उसको हिला के देखा,कोई आवाज़ नहीं...
"आपको बेहद तक़लीफ़ दी मैंने, मुआफ़ी चाहूंगा, अब चलता हूँ" वो बोला,"पानी नहीं पियेंगे?" मैंने पूछा,"जी, ज़रूर पिऊंगा, आप पिलाएंगे तो!" वो बोला,"और मुश्क़ भर...
मुझे दे दी,मैंने शर्मा जी को दे दी,वो खुश हो गए,माथे से जैसे,पसीना झिड़का उसने!और फिर,एक बड़ी सी किताब निकाली,इक डिब्बा,उसमे क़लम दवात थी,क़लम डुबोई उसने,...
शालीनता से,"मौलाना साहब तो हैं नहीं यहां?" मैंने काः,"जी, आपने बता ही दिया था, मैं अर्से से ढूंढ रहा हूँ, मिले नहीं, आपकी वाक़फ़ियत है उनसे, मैं अब बार ...
हम नीचे आ गए,और आ बैठे अहाते में,जहां कुर्सियां पड़ी थीं!अँधेरा नाच रहा था!प्रकाश से,लोहा ले रहा था!वो फड़फड़ाती हुई लाइट,इस बार जल उठी!कीट-पतंगे झपट पड़े...
बेहतरीन इत्र रहा होगा वो!चाय-नाश्ता किया,और फिर बाद में भोजन,और फिर आराम,अब जैसे,उस हल्कारे का इंतज़ार था!मन में,व्याग्रता थी बहुत!व्याकुलता,चरम पर,जा ...
