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सभी चपल अवस्था में थे!जैसे सोये हुए थे ही नहीं!सजग और ताज़गी से भरपूर!शर्मा जी और अश्रा,दोनों मेरे पास आ गए,बाहर देखा उन्होंने,वही देख रहे थे जो मैंने ...
लगता था कि,यहां इस पिशाच-ग्राम में भोर होने को है!मैं उठा,खिड़की तक गया,बाहर झाँका,बाहर पेड़ लगे थे,हलकी हलकी हवा में उनके शीर्ष,हिल रहे थे, इस से हवा क...
मुझसे पूछा कि क्या हुआ?यहां क्यों खड़े हो?मैं मुस्कुराया,और यही मेरा जवाब था,उसने मेरा हाथ पकड़ा,और ले चली वापिस वहीँ,मैं बैठ गया,वो भी बैठ गयी,फिर लिटा...
अँधेरा था,हवा यहीं से ही आ रही थी!यहाँ कोई दीवार नहीं थी!लगता था,कि, यही है हमारा संसार!यहीं है वो संधि!तभी मैंने पीछे देखा,अश्रा ने करवट बदली,लगता था...
बाहर अँधेरा था?फिर ये कैसे? ये क्या हो रहा था?प्रकृति के सिद्धांत और नियम,यहां आ कर,सब खंडित हुए जा रहे थे!आँखें एक पल को अँधेरा,और एक पल को उजाला द...
बहुत सारे थे!बहुत सारे!इकट्ठे खड़े थे सभी!लेकिन अन्धकार में,उनके सर ही बस,हिलते दीख रहे थे!हाथ-पाँव नहीं!फिर बाहर आवाज़ें आनी शुरू हुईं!जैसे चीख-पुकार म...
अब बंद था वो दरवाज़ा!अँधेरा था वहाँ!ये हो क्या रहा था?लग रहा था,कि किसी रेलगाड़ी के,साथ जुड़े डिब्बे के तरह,ये कमरा भी भागे जा रहा है कहीं!लेकिन गाड़ी कहा...
किसी की भी आवाज़ नहीं थी!मैंने पीछे देखा,और सन्न रह गया!अश्रा नहीं थी वहाँ!मैं खड़ा हुआ,तेजी से आया,और आसपास देखा,नहीं थी अश्रा वहाँ?अब दिल धड़का मेरा!मै...
अँधेरा था!ये क्या?कमरे में उजाला,बाहर अँधेरा?ये क्या?मैं उस कक्ष से बाहर आया,बाहर?नहीं!नहीं!नहीं आ सका!बाहर आने का रास्ता ही नहीं था!हम सब,जैसे क़ैद थे...
फिर ध्यान से देखा,घड़ी बंद सी लगी मुझे!कान से लगाई,चल रही थी!शायद भ्रम रहा होगा मेरा!अश्रा, अपने दोनों हाथ,अपने सर की नीचे किये हुए सो रही थी,उसकी हाथ ...
फिर मुझे,सजी-धजी अश्रा की याद आई!"बड़ी ही सुंदर लग रही थीं तुम अश्रा!" मैंने कहा,"सच में?" उसने पूछा,"हाँ, सच में!" मैंने कहा,"झूठ?" उसने पूछा,"नहीं! स...
एक कक्ष आया,लेकिन पहले कहाँ था ये कक्ष?पहले तो नहीं था?अब कहाँ से आया?और वो,वो जहां से हम,उस बगीचे में गए थे,वो रास्ता कहाँ है?नहीं आया समझ कुछ भी!कुछ...
"क्या प्रस्थान करें?" मैंने कहा,"अभी बाहर रात्रि है!" बोला नकुश!अभी भी रात्रि?समय ठहर गया है क्या?यहीं आकर,दिमाग रुक जाता था!ये कैसा अजीब रहस्य था!दो ...
ये ईमानदारी नहीं होती,तो आज कैसे आते हम यहां!मैं तो ऋणी हो गया था भरत सिंह जी का!तभी वही दो स्त्रियां आयीं,एक पोटली लिए,नकुश को थमा दी,नकुश ने,मुझे दे...
एक अत्यंत क्रूर योनि!यहाँ आकर, मेरी वो मान्यता,पूर्णतया खंडित हो चुकी थी! अब अंदर चला मैं!सीधा वहीँ जहां वे सब बैठे थे,अब नकुश ही था वहाँ अकेला,बाकी...
