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दो से अधिक का समय था!अब यहाँ नकुश रुका, महिष भी रुका,और अब वे दोनों हमसे मिले,बड़े ही प्रेम से,"दुबारा कब आएंगे भाई?" पूछा नकुश ने मुझसे,"अवश्य ही आऊंग...
ये ग्राम,अब कभी न मिटने वाला इतिहास बनने वाला था! अश्रा मेरा हाथ पकड़े थी,हम तो जैसे कोई,अति-विशिष्ट अतिथि थे उस ग्राम के!खिड़कियों से भी लोग,देख रहे ...
"जब आप बुलाओगे!" वो बोले,"आप जब मर्ज़ी आ सकते हैं" वो बोला,और भरत सिंह को गले लगा लिया!फिर हम सबसे गले मिला,और अब बाबा ने हाथ जोड़कर,आज्ञा मांगी!उस भीड़ ...
प्रतीक्षा कर रहे हों हमारी,वो भी,कई बरसों से!चार स्त्रियां अश्रा की तरफ बढ़ीं!उसको ले गयीं अपने साथ!हम सभी बैठ गए थे अब!लोग बढ़ते जा रहे थे!जैसे कि कोई ...
"हमे अपने संसार में भी तो लौटना है न!" बाबा ने कहा,"हाँ, ये आवश्यक भी है, जानता हूँ" बोला नकुश!"इसीलिए आज्ञा चाहते हैं अब" बोले बाबा,"आप जाना ही चाहते...
और खखार कर गला साफ़ किया अपना,और अपना सामान समेटने लगे!अब हम खड़े हुए,और वे सब भी,मन्नी ने सारा सामान संजो लिया था,भरत सिंह ने,अपना गमछा अपने गले में डा...
"बस, थोड़ा विश्राम कर लें, उसके बाद चलते हैं" वे बोले,"कोई एक घंटे बाद?" मैंने पूछा,"हाँ, इतना ही" वे बोले,अब मैं उठा और अश्रा के पास चला गया,बता दिया ...
लाजवाब खाना था!एकदम जिन्नात वाला!वही स्वाद,वही रंग,वही ज़ायक़ा!छक कर खाया हमने!और जब खा लिया,तो एक पेय दिया गया, गिलास में,मैंने घूँट भरा,ये जलजीरा था श...
मैंने अश्रा को देखा,उसकी साड़ी को देखा,कोई तिनका नहीं चिपका था,घास का कोई निशान नहीं,न ही मिट्टी का,किसी के भी कोई ऐसा निशान नहीं था!सभी साफ़-सुथरे थे!ह...
और दिन में भी रात!ऐसा अजीब सा था सबकुछ यहां!न सूरज,न चाँद,न तारे,न पक्षी,न कीट-पतंगे!कुछ नहीं!प्रकृति के नियमों को,झुठलाते यहां के नियम!इनके अपने नियम...
और न पक्षी ही!ऐसा अजीब था सबकुछ! ऐसा तो मैंने कभी जिन्नाती गाँव में भी न देखा था!इनमे और उनमे,ज़मीन आसमान का फ़र्क़ है!जिन्नात हमसे कहीं अधिक मिलते जुल...
रोएँ खड़े हो जाते थे!कपड़े बहुत,ठंडे हो जाया करते थे,बार बार हाथ फेरना पड़ता था!और देखिये,शर्मा जी पूर्व में जाते थे ठहलने,और पश्चिम से आते हुए दिखाई देत...
आज थे!कल वो दूसरा बगीचा था,आज नहीं था,कल वो कक्ष भी थे,आज एक भी नहीं था!पता नहीं कहाँ चले गए थे सब!अब चाहे,कितना ही सर खुजा लो,कितना ही सर धुन लो,उत्त...
वहाँ की घास,हल्के पीले रंग की थी!मुलायम और ठंडी!मैं और अश्रा एक पेड़ के नीचे बैठ गए,शर्मा जी जूते खोल,टहलने लगे,बाबा नेतनाथ और दूसरे लोग,भी बैठ गए वहीँ...
मिठाई भी ताज़ा,और दूध भी गर्म!ताज़ा दूध,ख़ुशबूदार!हम निबट गए उस नाश्ते से,बर्तन उठा लिए गए,"आप चाहें तो बाहर घूम सकते हैं, बाग़ में" नकुश ने कहा,ये बढ़िया ...
