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उनका सान्निध्य मिला,ये भी किसी उपकार से कम नहीं!बाबा नेतनाथ अविवाहित ही रहे,कोई संतान नहीं थी,उनका डेरा आज मन्नी संचालित करता है!मन्नी!ये मन्नी ही था ...
मित्रगण!अश्रा एक माह मेरे संग रही!एक माह के बाद,लाख समझाने के बाद,मैं उसको छोड़ आया!तब भी वहां तीन दिन रहा!उसके बाद, उसका मेरा सिलसिला,कभी नहीं टूटा!आज...
मैं शर्मा जी के कक्ष में चला गया!शाम हो ही चुकी थी!और कई दिनों से,कड़वा पानी नहीं पिया था!प्यास लगी थी!सहायक से सामान आदि मंगवाया और खोल ली हमने,हर रोग...
फिर बस पकड़ी,और इलाहबाद आ गए!इलाहबाद में दिन भर रहे,और रात्रि समय भोजन करने के पश्चात,हमने दिल्ली की गाड़ी पकड़ ली!अश्रा मेरे साथ दिल्ली ही जा रही थी!हम ...
वे वस्तुएं!वो बाग़!वो गाँव!सब!किसी तरह उलझे-पुलझे रात काटी,और सुबह आई!अब नहाये-धोये!चाय-नाश्ता भी किया!अश्रा पास आ बैठी मेरे,माला उतार दी थी उसने!कोई ए...
घुप्प अँधेरा था वहाँ,बस गाड़ी की बत्तियां ही अँधेरे को चीर रही थीं!हम आ गए भरत सिंह के घर!उसी दोपहर बाद गए थे,उसी रात आ भी गए!किसी को ये बताऊँ,तो सलाह ...
मैं रुका,और अश्रा को देखा,माला अभी भी थी!हम फिर चल पड़े आगे,और पहुँच गए उन पत्थरों तक,वहीँ गाड़ी खड़ी थी!सामान रखा गाड़ी में,और सभी एक एक करके बैठे,मैं भी...
मैं चुपचाप खड़ा था,रहस्य खुल रहे थे!वो बीस घंटे हमारे जीवन के,कहाँ गए?वो रात?कहाँ गयी?ऐसे शून्य में लोप नहीं हो सकती,वो बाग़?घास?वो मंदिर?वो हीरे?वो त्र...
शर्मा जी?मैं?क्यों?क्यों सहज ही मान गए थे?किस कारण से?अब न रहा गया!बिलकुल भी नहीं!सब सहज नहीं था! कोई रहस्य अवश्य ही था बाबा के पास!आग लगी थी मेरे सर ...
और वो मूर्त रूप था!सबकुछ असली था!उन्होंने क्या मेहमान-नवाजी की थी?उन्होंने हमारी इच्छा को मूर्त रूप दिया था!वो भोजन!जैसा स्वाद मैंने चाहा,वैसा!अश्रा क...
"वे सब जानते हैं, समझे? सब! अब समझे?" उन्होंने कहा,मैंने हाँ में धीरे धीरे गर्दन हिलायी अपनी!"बाबा?" मैंने पूछा,"हाँ?" वे बोले,"यदि मैं आऊँ यहां कभी द...
सवा नौ?रात के सवा नौ?मतलब हमे केवल पंद्रह ही मिनट हुए हैं?और वो,वो जो हम बीस घंटे उनके साथ थे,वो क्या था?दिमाग फटने को तैयार अब!परखच्चे उड़ जाते!यदि बा...
मैं भाग पड़ा वापिस,टीले पर चढ़ गया,शर्मा जी और अश्रा भी भागे मेरे साथ ऊपर ही,मैं टीले पर पहुंचा,और सामने देखा,जहां कल गाँव की रौशनी दिखाई दे रही थीं,अब ...
जैसे ही पानी पड़ा,आँखों में पीड़ा हुई,मैंने आँखें रगड़ीं अपनी.सभी ने,सभी ने,बस बाबा नेतनाथ ने नहीं!और जब आँखें खुलीं,तो अँधेरा था!घुप्प अँधेरा!रात का स्य...
एक एक करके!मैंने पीछे मुड़कर देखा,अब वो जगह, जहां वे खड़े थे,ओझल हो चुकी थी!मैं आगे बढ़ा,और बाबा के पास पहुँच गया!बाबा टीले पर खड़े थे,उतरते ही,हम अपने सं...
