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फिर भागीं क्यों?क्या उद्देश्य था?सब बहुत उलझा हुआ था!अभी भी कुछ पकड़ में नहीं आया था!यूँ कहो,कि धूल में लट्ठ भांज रहे थे हम!लेकिन जो खेल यहाँ हो रहा था...
एक आगे बढ़ी,मुझे घूरते हुए,अपना हाथ,सीधा हाथ आगे बढ़ाया,जैसे मैं पकड़ लूँ उसका हाथ,मैंने नहीं पकड़ा,मैं वैसे ही खड़ा रहा,फिर एक और स्त्री आ गयी वहाँ,वो भी ...
'त्रिश..कुम...रिद्ध....एलुम...स्फट...स्फट.....उलूम'कुछ ऐसे शब्द थे!मेरी मस्तिष्क की डिक्शनरी में थे ही नहीं ये शब्द!आवाज़ ही आ रही थी,दिख कोई नहीं रहा ...
नीले,सफ़ेद!खुशबू उठ रही थी!ये कहाँ से आये?फूल?दिमाग दौड़ा बहुत तेज!बहुत तेज!प्रणयरत पुरुष याद आ गए!वो मूर्तियां!सरकटी मूर्तियां!मैं तेजी से आगे चला,शर्म...
उन में से किसी का भी मस्तक नहीं था!मस्तक काटकर, उन पुरुषों की गर्दन के नीचे रखे गए थे!और उन गर्दनों से बहते खून तो एकत्रित करने के लिए,पात्र रखे गए थे...
ये छोटा सा मंदिर जैसा था,ऊपर छतरी भी बनी थी!हम बैठे आराम से,और उस मंदिर में रौशनी मारी,ये एक स्त्री की नग्न मूर्ति थी,उसके ऊपर केशों से बने वस्त्र पहन...
अँधेरा था वहाँ!टोर्च की रौशनी डाली वहां!तो नीचे वहाँ एक बारामदा था!हाँ, बारामदा ही था वो!ये एक षट्भुज आकार का बारामदा था!उसमे नीचे आने के लिए,छह सीढ़िय...
ये और भी संकरा था!इसमें तो,टेढ़ा होकर ही जाया जा सकता था!मैं बार बार,यही सोच रहा था कि,ऐसा संकरा रास्ता किसलिए?ये जानबूझकर बनाया गया था,तो क्यों?कौन नि...
झन्न!झन्न!मैंने सोचा शायद पानी है आगे!मैं रुक गया,फिर आवाज़ बंद हुई!और हम नीचे उतरे,यहाँ सीढ़ियां साफ़ सी थीं!जैसे झाड़ू मारी गयी हो उन पर!हम आहिस्ता आहिस...
पत्थरों से बना था!एक बात और,वहाँ कोई मकड़ी का जाल नहीं था,न कोई कीड़ा-मकौड़ा,और न ही कोई चमगादड़,इसका अर्थ ये हुआ,कि इस पूरे निर्माण में,कहीं भी कोई भी, ब...
कूड़ा पड़ा था, कंकड़-पत्थर,और न जाने क्या क्या!मैंने एक बड़ा सा पत्थर उठाया,और सामने फेंका,पत्थर गिर पड़ा सामने,अर्थात,धसकने वाली ज़मीन नहीं थी वो,अंदर जाया...
पीले रंग की,और कुछ नहीं था,टेढ़ा-मेढ़ा होकर देखा,तो उस दीवार के साथ कोई रास्ता था,लेकिन अँधेरा था वहां भी,नीचे का फर्श दीख नहीं रहा था!अब ये ये सीढ़ियों ...
अभी फिलहाल में तो कुछ भी नहीं,बस शुरू करने जा रहे हैं,उन्होंने शाम को वापिस आने को कह दिया,रात को रुकना ठीक नहीं था वहां,आसपास आबादी थी नहीं,जंगल ही ज...
एकदम से खयाल आया,वो रास्ता!वो संकरा रास्ता!अब मैंने शर्मा जी को संग लिया,और चल दिया उधर,"गुरु जी?" शर्मा जी ने कहा,"हाँ? क्या हुआ?" मैंने कहा,"ये काली...
बहुत तेज!झन्न!झन्न!हमने कुँए में झाँका!भंवर खाते हुए,पानी ऊपर आ रहा था!बहुत वेग से!लेकिन!गौर से देखा!ये पानी नहीं था!ये तो रक्त था!भयानक बदबू थी उसमे!...
