Last seen: May 3, 2026
कि वो जाए वहां से,किसी ने देख लिया तो,अंजाम बहुत बुरा होगा,लेकिन नहीं मानी ऊषल!अपनी ज़िद पर अड़ी रही!औरांग की देह कांपती रही!और ऊषल,अभी भी रिझाती रही उस...
उसने देखा था खल्लट को,ऐसी सजा देते हुए!खुद उसने कई ऊंटों का पेट फाड़ा था!सजा दी थी,दगाबाजों को!लेकिन ये औरत ऊषल!धधक रही थी प्रतिकार की अगन में!और ये और...
औरांग विचलित नहीं हुआ!वो जानता था,कि ऊषल,पत्नी है उसके मित्र,खल्लट की,जानता था वो!बखूबी!लेकिन,इस ऊषल ने,कोई क़सर नहीं छोड़ी उसको रिझाने में!उसको बुलाती,...
मान-सम्मान रखता था!मित्रता निभाता था!खल्लट,महाविद्या का पूजन करता था!और बलि-कर्म किया करता था!उसका कोई सानी नहीं था!उसके इस समुदाय में,सभी ऐसे ही लोग ...
लेकिन ऊषल नहीं भूल पायी थी अपने पिता और,अपने उन दोनों भाइयों की हत्या,खल्लट ने, विवाह कर लिया था इस ऊषल से,ऊषल, इस खल्लट की उम्र के आधे से भी आधी थी!ख...
दिखने में ये स्थान,आज शांत था!चुप था!लेकिन,यहाँ एक कहानी छिपी थी!एक क्रूर कहानी!और ये कहानी यहां से नहीं,राजस्थान के एक गाँव से शुरू होती थी!यहां एक स...
मुझे कुछ भी समझ नहीं आया था,बाबा जागड़ ने जो कुछ जाना,अपने योग-बल, तंत्र-बल से,मुझे बताया!जैसे जैसे परते खुलती गयीं,वैसे वैसे एक कहानी उभरने लगी!एक वीभ...
अब जो शब्द मेरे मुंह से निकले,वो किश्कि भाषा थी!मुझे यक़ीन ही नहीं हुआ!मैं बाबा जागड़ की जद में था!मेरी उस व्यक्ति से,करीब आधा घंटा बात हुई!क्या शब्द थे...
क्योंकि उसने अपनी छाती को हाथ लगाया था!कि मैं, सुबह मिलूंगा!ये किश्कि भाषा थी!और ये भाषा उस योगिनी-सम्प्रदाय की मूल भाषा थी!अब बाबा जागड़ ने आदेश दिया,...
वही ढाक के तीन पात!हम जहां थे,अभी भी,वहीँ थे!सुबह हुई,और हम अब चले वहाँ से,पिटे हुए!हारे हुए!थके हुए!मायूस!खाली हाथ!हम चल पड़े वापिस,और तभी मेरा फ़ोन बज...
ये कौन सी भाषा है?मैंने बहुत ज़ोर लगाया समझने का,लेकिन नहीं समझ सका,"ऊर बिला?" वो बोला,अपनी छाती पर ऊँगली रखते हुए!अफ़सोस!मैं नहीं समझ सका!और तभी आवाज़ ह...
वो रो रहा था,काँप रहा था,मज़बूर हो,ऐसा लग रहा था!"कौन हो तुम?" मैंने पूछा,वो काँप गया मेरी आवाज़ सुनकर,घुटनों पर बैठा था,नीचे गिर पड़ा,अपने आपको संभाला उ...
और पीछे हटें,तो और बुरा हाल!अब हम वापिस चले,अपनी गाड़ी की तरफ,दिमाग में विस्फोट हुए जा रहे थे!लगातार!हम वापिस हुए,धीरे धीरे चलते हुए,और जैसे ही आये वहा...
कुछ नहीं लग रहा था हाथ मेरे!मैं अपना मन मसोस के रह जाता,एक ऐसा योद्धा,जिसके तरकश में बाण तो हों,लेकिन ये सुनिश्चित करने में असफल,कि कौन सा अस्त्र प्रय...
वे सभी अँधेरे में गायब होते चले गए,और हम उन्हें,ओझल होते देखते रह गए!यहां तो कोई,बड़ा ही खेल चल रहा था!मेरी सोच से भी बड़ा!और वे चार पुरुष!उन्होंने तो औ...
