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बहुत बेचैन था औरांग!तीसरे दिन फिर वही लड़की आई,और उसको खबर दी,प्यासे की तरह से,उसने एक एक शब्द की बूँद का पानी पिया!शाम को जाना था उसे,और अभी समय था!तड़...
छोड़ सकता नहीं उसे!अब तो जान से अधिक प्यारी है वो!तो फिर,किया क्या जाए!ये सवाल,बार बार गूंजता उसके दिमाग में!हाँ!एक तरीका हो सकता है!यहाँ से भाग लिया ज...
धधकती हुई आग लिए!शांत तो हुई नहीं थी,भड़क और गयी थी!ईंधन और झोंक गयी थी ऊषल!चला धीरे धीरे वहाँ से,और उतरा,अब वापिस हुआ,अपने घर के लिए चला,पहुँच गया घर ...
"क्यों मना किया था?" उसने पूछा,"अब उसकी मर्जी" वो बोली,मर्जी!हाँ!मर्जी!गुस्सा सा चढ़ आया औरांग को!खल्लट!यही नाम गूंजता रहा उसके कानों में! बाहों में ...
औरांग भागा!उसके पीछे!और जा लिपटा ऊषल से!देह का यौवन भड़क उठा!पौरुष ने डंका बजाया!चूमता ही रहा उसे!बार बार!बार बार!जब तक,थक नहीं गया!साँसें नहीं फूल गयी...
कोई आधा घंटा बीता होगा,की वही लड़की फिर से आई वहाँ!दिल धड़का!पांवों में पहिये लगे!दौड़ के पहुंचा उसके पास!खबर सुनी!बावड़ी पर जाना था उसको!ठीक एक घंटे बाद!...
देख रही थी उसे,मुस्कुरा गयी!औरांग खुश हो गया!जोश भर आया!तरंगें उठ गयीं!और चल दिए सभी बाहर!आखिर में जाने वाला, बाहर,औरांग ही था!घर पहुंचा!और आराम किया ...
देख रही थी उसे,मुस्कुरा गयी!औरांग खुश हो गया!जोश भर आया!तरंगें उठ गयीं!और चल दिए सभी बाहर!आखिर में जाने वाला, बाहर,औरांग ही था!घर पहुंचा!और आराम किया ...
गिलास लिए!घूंघट काढ़े!ओंस की सी बूँदें टकरा गयीं चेहरे से औरांग की!नज़रों को जैसे जल मिला!तपती रेत में जैसे,बारिश पड़ी!देह उसकी,तर हो गयी अपनी प्रेयसी की...
अपने स्थान पर!खल्लट के यहां!दिल बहुत खुश था औरांग का!अपनी प्रेयसी के पास आ पहुंचा था औरांग!इस से पहले,वो माल-ओ-असबाब,बंसा को ही सौंप देता था,और फिर अप...
उसकी गंध,साल देते उसे!भोजन, भोजन न लगता उसे,पानी, पानी न लगता उसे,एक माह बीत गया था,उसके दिन ऐसे बीत रहे थे,जैसे दीवार पर लकीरें काढ़ता हो रोज!एक दिन क...
यारी हो गयी औरांग की उस रात!अता-पता दे दिया गया एक-दूसरे को!और सुबह,वे अपने अपने रास्ते हो लिए!यात्रा फिर से आरम्भ हुई,औरांग की,ऊषल की याद में डूबा और...
जान नहीं थी उसमे आज!बस,चले जा रहा था!यात्रा लम्बी थी,कल ही पहुँचता वो,रात में,यदि मौसम साफ़ रहा तो!चलते गए,और घोड़े,हवा से बातें करने लगे!सारा दिन चले,र...
आ खड़े हुए उसके घर के आगे,आवाज़ दी,वो चला बाहर,सांकल लगाई,ताला लगाया,और चल दिया बाहर,सभी से नमस्कार हुई,बंसा आया था वहाँ!बंसा!खल्लट का भतीजा,अपने पांच स...
निकल गयी वो वहाँ से!नहीं रोक पाया औरांग उसे,कैसे रोकता!कैसे?चली गयी वो!वो दौड़ के बुर्जी पर पहुंचा,और देखता रहा उसको जाते हुए,पीछे मुड़ मुड़ कर,कलेजा छलन...
