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अब भोग तैयार था! और अब में अंतिम चरण के आहवान में बैठ गया! अब गहन मंत्रोच्चार हुआ! वहाँ, वहाँ भी यही चल रहा था, हुँदा, बेतहाशा चीख-पुकार मचाये हुए था!...
और न हम ही कम! सामर्थ्य की लड़ाई थी, ज़ारी थी अभी! अचानक ही बाबा हुँदा चिल्ला पड़ा! अर्थात, उसको भान हो चला था कि, पुण्ड-भंजिनी, उसकी आराध्या जाग चली ...
का नाम नहीं ले सकता मैं, ये जहां उनका अपमान होगा, वहीं मेरे लिए पाप होगा! तो ये सरभंग अब गेरुआक्षी का आह्वान कर रहा था! आज भी एक पर्वत पर, इसका मंदिर ...
केश बाँध, चुप बैठा था, पता नहीं कैसा सरभंग था वो! कुछ कर भी नहीं रहा था! हाँ, बाबा सेवड़ा, उसको जैसे कै लग गयी थी! पेट में मरोड़ उठने लगी थीं उसको शाय...
और जो अब सामने देखा, वो ऐसा था, कि जैसे साक्षात शक्त-दुर्गा के दर्शन हो गए हों! ऐसा शरीर! ऐसा गोरा वर्ण! ऐसे शस्त्र! ऐसी शक्तिशाली भगिनियाँ! ऐसा माहौल...
. . . जैसे पीले रंग की, चटख पीले रंग की, रजाई उढ़ा दी गयी हो वहां सभी को! कैसा नज़ारा था था वो! अद्भुत! कोई यक्षिणी जब प्रकट हुआ करती है तो, ...
तो वहां कनेर के फूल थे, पीले कनेर के फूल, बड़े बड़े, एक टेरी सी बन गयी थी वहां, और वायु जैसे उस ढेरी को, एक कालीन या आसान का सा रूप दे रही थी! उन फूलो...
फ़ीट से होकर, सीधा दस फ़ीट की हो गयी! बहुत विशाल घेरा बनाती हुई और उसमे से जैसे चटक चटक, की आवाजें आयीं, जैसे रक्त ईंधन के रूप में पड़ा हो उसमे! और...
बकरे के कलेजे से दोगुना था, रंग भी अलग ही हुआ करता है उसका, गहरे भूरे रंग का, और बकरे का लाल सा या काला, हुआ करता है, मेढ़े का कलेजा कठोर और बकरे का, ...
और उधर, एक ही वार से, बाबा सेवड़ा ने, उस मेढ़े का सर जुदा कर दिया उसके धड़ से! तो अब तंत्र की दो महा-शक्तियों का आह्वान चल रहा था! एक ओर जहाँ त्रिपात्...
ने! मेरे मन में उसके लिए मान तो था, लेकिन इस मान रूपी बूरा में, सफ़ेद नमक भी पड़ चुका था! "वज्रपाणिका!" बाबा के स्वर गूंजे! ओह! कैसे? मैं कैसे स...
कालरूपा! मृत्युमुखा! ऐसी शक्ति है ये! एक उच्च कोटि की महाप्रबल महाशक्ति। बाबा सेवड़ा ने सिद्ध किया था इसको! तभी मैंने लिखा वाह! वाह! सच में ही घोर ...
मैं उनका आशय समझ गया! दक्खन-चंद्रा ले आई थी अष्टभुजिका को अपने संग! वाह! वाह बाबा मतंग वाह! कभी भी, ऐसी दो शक्तियों में टकराव नहीं होता! ये तो समकक्षत...
उस प्रकाश में वहाँ की मिट्टी, घास, वो घाइ, हम सभी, झिलमिला रहे थे! बाबा उठे, आकाश की तरफ हाथ किये! और दक्खन-चंद्रा के आह्वान के अंतिम मंत्र, जोर जो...
सब याद थीं। और बाबा मतंग! बिन किसी लालच के, मौत के इस कुँए में आ डटे थे! एक वो औघड़, और एक बाबा मतंग नाथ! तभी अचानक से, बाबा के इर्द-गिर्द प्...
