Last seen: May 3, 2026
@kaal-purush एक ही शक्ति काफी जगह हो सकती है।
एक सबक लिया, कभी दम्भ न कीजिये! विवेक और बुद्धि, सदैव इनकी ही सुनिए! कल, एक नयी शुरुआत करूँगा, एक नए संस्मरण की! आप सभी को बहुत याद किया मैंने! बहु...
उसमे शोर नहीं था! बस, घनघोरता थी उसमे! और तब आवाजें आणि शुरू हुई! जैसे कोई पूरी अलौकिक सेना बढ़ रही हो उस स्थान की तरफ! पत्थर भी हिल रहे थे और वहाँ...
पर छलके पसीने भी जैसे ओंस बन गए थे! हमारे मुंह से धुआं निकलने लगा था! ऐसी ठंड लग रही थी! तभी फिर वहाँ अंगार से उठे! भूमि में से अंगार से प्रकट हुए! ...
और उसका जीव-द्रव्य बाहर रिसने लगेगा, मांस अस्थियां छोड़ने लगेगा, अस्थियां काली पड़ने लगेंगी, जोड़ अकड़ जाएंगे और उनको सीधा करने के लिए, काटने ही पड़ें...
और फिर मैं! बाबा मतंग नाथ का चेहरा देखा, अपमान साफ़ झलक रहा था! वे तीनों वहाँ खिलखिलाकर हंस रहे थे! उनकी एक एक हंसी, मेरा वजूद छीले जा रही थी! फिर क्य...
और अब ये चिन्ह इतना प्रबल हो चुका था कि, भझंडा भले ही उनको प्राण-रक्षण प्रदान कर देती, लेकिन बाबा मतंग नहीं बख्शने वाले थे उन्हें! और सच पूछिए तो मैं ...
और फिर एक कर्ण-बीध अट्टहास हुआ! ऐसा महा-अट्टहास की कानों के पर्दे भी गरम हो गए! मन्त्रों में और, तंत्राभूषणों में न बंधे होते तो मस्तक ही फट जाता! ...
और ये गंध! जा पहुंची थी उस पार भी! उस गंध ने, जैसे बदन छील दिए थे उनके! उनको तो जैसे काठ मार गया था! बस आह्वान में ही जुटे थे! असीमनाथ की हालत खराब...
जायेगी और हम सभी, समा जाएंगे उसमे! बाबा मतंग नाथ ने आहवान तेज किया! स्पष्ट था, अज्म-कालिका के मन्त्र जागृत हो चले थे! वो स्थान अपने अनुसार ढाला जा रहा...
और बाबा मतंग, विकराल सा रूप धारे, आँखें चौड़ी किये, आह्वान में सतत आगे बढ़ते जा रहे थे! सहसा ही, वाचाल के शब्द गूंजे! कानों में पड़े! कर्ण-पिशाचिनी का...
तो अब आह्वान हो रहा था! खबर तो उनको भी थी! अब बाबा हुँदा और बाबा सेवड़ा, और वो भीरु बाबा असीमनाथ! अलख के चारों ओर आ बैठे थे! चक्रेश्वरी-विद्या ने बता ...
खैर, बाबा ने अलख में ईंधन झोंका, बाबा बच्चा सिंह भी उस आह्वान में जुट गए! अलख में ईंधन झोंकते, और जाप करते जाते! बाबा बच्चा सिंह ने रक्त-पात्र आगे रखे...
बाबा मतंग नाथ, स्वयं ही प्रकट हुए हों वहाँ! चेहरे सफेद, फक्क पड़े थे उनके! अब बाबा मतंग ने, भूमि पर थाप लगाई! और फिर से चिमटा बजाया! कुल ग्यारह ...
दीर्घ-देहधारी स्त्री! और फिर प्रकाश! अद्भुत प्रकाश! ताप वाला प्रकाश! झुलसा देने वाला प्रकाश! और सहसा ही, पुण्ड-भंजिनी की संगिनियाँ, क्रंदन करती ...
