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बोली गंगा! जोश में!! "क्या हुआ गंगा?" माला ने पूछा, "वो! वो भूदेव! आ रहे हैं!!" बोली गंगा! इशारा करके उस रास्ते की तरफ! दोनों भाग खड़ी हुईं उसी रास्ते...
किसी ने घंटों साज-श्रृंगार किया हो उसका! अवाक थी माला! और तभी जमना भी आई अंदर! गंगा को देखा तो मुंह खुला रह गया! चाँद की चांदनी ने पूरा बदन ढक दिया था...
बन गंगा?" बोला वो! ज़िद्दी तो बहुत थी गंगा! "मान जा?" बोला वो! नहीं मानी! "अछा, चल माफ़ी मांगता हूँ मैं! उस दिन गुस्सा हुआ तुझसे! ले कान पकड़ लिए!" बो...
कँए पर भी आना जाना बंद सा ही हो चला था! अपने आप में मग्न सी रहने लगी थी! माला कभी बात करने की कोशिश करती और माला को घुरती रहती! न बात करती! न पहनने का...
मैं उसे! तेरे पांवों की मिट्टी में तेरी ख़ुश्बू होती थी, मुझे बहुत अच्छी लगती थी वो खुश्बू! मैं जानता था की मैं प्रेत हूँ, लेकिन गंगा, जी के आगे विवश ...
गया था! गंगा उठी, और चली वापिस, अपने कमरे में आई, कमरे में आते ही देखा, सारे फूल गायब थे! अब कुछ नहीं था वहां। वो लेट गयी बिस्तर पर! मिट्टी लगी थी कपड...
"बोल?" बोली वो, "तुझे तरस नहीं आता?" बोला वो, "तुझे आया?" पूछा, चुप वो! "तुझे आया तरस? एक निष्पाप को तूने फालिज दी, तुझे आया?" पूछा गंगा ने! "मे...
"क्या कर रहा है तू?" वो घुड़सवार बोला उस घुड़सवार से! "कु....कुछ नही" बोला वो! "रास्ता क्यों रोका है इनका?" पूछा उसने, "पता पूछ रहा था" बोला वो, "ऐसे?...
"तूने किया न ये सब?" पूछा गंगा ने! "हाँ, किया, कितना दुःख है न तुझे उसके लिए, क्योंकि वो जिंदा है, इसलिए न? काश मेरे लिए भी तुझे दुःख हुआ होता, भले ही...
और थोड़ी ही देर में उस घुड़सवार का घोड़ा धीमा हुआ,आ रहा था धीरे धीरे, बुक्कल हटाया उस घुड़सवार ने! नहीं, ये भूदेव नहीं था! गंगा के सीने में, बड़ा सा प...
आ?" बोला वो! कुछ न बोली वो। "आ न?" बोला वो! गंगा कुछ न बोली अब भी! "आ न गंगा?" बोला वो! गंगा पर्दा डालने को ही थी कि, "सुन? देख, मिठाई लाया हूँ तेरे ल...
और रो पड़ा,रोते रोते, बैठ गया नीचे! "मैं छूट नहीं सका गंगा, माँ की याद आई, बड़े भाई की याद आई, मैं गया घर, तभी की तभी, माँ नहीं मिली जीवित, और न मे...
आँखें नीची किये हुए, खड़ा था वो! गंगा आगे गयी, बिना डर के, उसके पास! गंगा आगे बढ़ी, उस तेजराज के पास, जिसने अभी कहा था कि उसका क़त्ल हुआ था उन्ही जेवर...
और चली आई कुँए तक, बाट जोहती आँखें, नहीं मानीं! बिछा दीं नज़रें। सामने, उस धूल भरे रास्ते में! रास्ता बियाबान! सुनसान! सन्नाटे का आलम! कोई नहीं आ रहा ...
कुर्सी पर, खिड़की के बाहर से, आवाजें आती रहीं, बार बार, गंगा! गंगा! "गंगा?" वो फिर से बोला! खिड़की के बाहर से। गंगा ने जवाब नहीं दिया, बैठी रही कुर्सी...
