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इसकी सिद्धि पुनः करनी पड़ेगी! तुलजा विंध्याचल में पूज्य भी है कई जनजातियों में, इसका पूजन आज भी होता है! और यै प्रत्यक्ष भी दर्शन दे देती है! वो श्रेष...
है, तो नेत्र सामान्य हो जाते हैं! ये मैत्राक्षी, कालप्रिया से कहीं अधिक शक्तिशाली है! पलाश वृक्ष की जड़ों में इसका वास रहता है, माँ में दो दिन, सरोवर ...
था, अचेत, कीड़े-मकौड़े रेंग रहे थे उस पर! फिर भी नहीं सोचा एक बार ही कि उसका भी ये हश्र हो सकता है! लेकिन उसको दम्भ था! उसको लगता था कि नव-मातंग महाक्...
करना! यही चाहता था मैं! सरभंग! अब दूर हुआ! दूर हुए अवरोध! दूर हुआ राह का काँटा! अब सम्मुख मैं और वो श्रेष्ठ! मैं खड़ा हुआ फिर! आगे आया! "श्रेष्ठ?" मैं...
नियमों के विरुद्ध कार्य किया! अब तू इस दंड का भोगी है! मैं तेरा क्या हाल करने वाला हूँ, जानता है?" बोला मैं! मुझे क्रोध था बहुत! अब मद चढ़ा था! औघड़ म...
और वो डरा! "समय है अभी भी!" बोला मैं! अवाक था वो! "मान जा! चला आ चला आ!" बोला मैं! खड़ा हुआ! और थूका सामने! नहीं मानेगा वो हार! चाहे कितने ही परकोट...
और तभी मेरे यहां प्रचंड शोर हुआ! जैसे पत्थर गिर रहे हों! भू-स्खलन हो रहा हो! जैसे भूमि फटने वाली हो! मैं हिलने लगा था, भूमि में कम्पन्न मची हुई थी! और...
और फिर! फिर, वर्षा सी हई! शीतल जल की वर्षा! मेरा शरीर, हल्का होने लगा! द्ववंद की, अब तक की सारी थकावट, जाती रही! मैं उठ गया था तब! अपनी साध्वी स...
ये सरभंग था! "हराम** ! क्या समझता है तू?" बोला वो! मैं शांत ही रहा! थोथा चना बाजै घना! "धन्ना! आज धन्ना पछतायेगा कि क्या सिखाया उसने तुझे!!" गला फाड़ ...
आज पहली बात आह्वान कर रहा था मैं इसका! मैंने इसका विशाल रूप जब देखा था तो कई दिवस तक, इसमें ही खोया रहा था! दीर्घ देह है इसकी! रूप में किसी सुंदरी ...
और वो श्रेष्ठ, अपनी साध्वी पर कोई क्रिया कर रहा था! उसी साध्वी, चिल्ला रही थी! अपने बाल तोड़ रही थी! खा जाती थी अपने बाल बार बार! वो खड़ी होती, बैठ...
गया था उसका इरादा! सरभंग ने अपना चिमटा फेंक मारा सामने! श्रुति भांप गयी मेरा इरादा, और मैं उसके संग संसर्ग मुद्रा में आ गया! तंत्र में, पुरुष रमण नहीं...
नहीं हुआ! कोई आश्चर्य नहीं! सरभंग यहीं से पकड़ करता है। यहीं से वार का आरम्भ करता है। घंट-नटी, मृत शिशुओं के शरीर के अंगों से पूजित है! इसको औघड़ सिद्...
और कुछ ही क्षणों में, आभामंडल से युक्त! वो ब्रह्मसुर्ना प्रकट हो ही गयी! मेरी साँसें थी तब! पल भर में,कुछ का कुछ हो सकता था! कर्ण-पिशाचिनी के कर्कश स्...
करके दिखायीं उसे! वो दरी और लेट गयी! मैंने वो शिशु-कपाल उसे वक्ष पर रख दिया, वक्ष पर रखते ही उसका शरीर धनुटंकार की मुद्रा में आ गया! यही मैं चाहता था!...
