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सुंदर लग रहा था! पीनी पी लिया तो रख दिया गिलास! और बैठ गयी वहीं कुर्सी पर! "एक बात पू?" कहा मैंने, "मैं जाउंगी ज़रूर!" बोली वो, मैं हंस पड़ा। सच मे...
"मिलवाओ ना! मिलवाओ!" बोली, मीठे शब्दों से! कुछ मक्खन भी लगा था उसमे! "मिलवा दूंगा!" कहा मैंने, "कब?" पूछा उसने, "शाम को कहा मैंने, "अभी चलो ना!" बोली ...
कहा मैंने, "हाँ, करता हूँ हरू बाबा से बात!" बोले वो, "किसलिए?" पूछा मैंने, "वे ये विद्या जानते हैं!" बोले वो, "मुझे अनुमति दें!" कहा मैंने, "आप कर लोग...
अब हुए हम खड़े! और देखा उस दिलफेंक को! "ओये बहन के ** ! फूल फेंका था अपनी बहन पर, बताया नहीं तूने, अपने इस जीजा को?" कहा मैंने, अब जो आये थे, वो सभ...
और तब छोड़ा उसे उन्होंने! "साले कुत्ते, नज़र आ गया तो फाड़ दूंगा बीच में से! निकल यहां से?" बोले वो, और वो चला मुंह रगड़ता हुआ! पीछे भी ना देखे! अच...
रहना! मिल गया उत्तर! कम से कम ना तो नहीं कहा!" कहा मैंने, शरारत सी खेल गयी उसकी आँखों में! जानता था, सिर्फ दिखाने का ही गुस्सा था! इराने का ही! "ये छल...
तो साक्षात लक्ष्मी स्वरुप होती हैं! मोती, या छोटी हों तो संतानहीन, गर्भ के रोगों से पीड़ित रहने वाली और पति का नाश करने वाली होती हैं। ऐसे बहुत से सूच...
लेकिन यहां सबसे अहम ये, कि कामेषी ने उसका हाथ पकड़ा, न केवल पकड़ा, उतारा! अपने स्थान पर ले गयी, पूरी बात सुनी, और वापिस भेज दिया! ये है रहस्य!" कहा...
लेकिन अब सबसे बड़ा पहलू जो उभरा था, वो ये की वो स्थान इसी धरा पर कहीं है, लेकिन कहाँ? और बाबा तेवत को कैसे पता कि वो स्थान यहीं आसपास है? कैसे पता ...
जहां उतारी गयी थी, वो कोई उपवन सा था, एक मंदिर था वहाँ! पुराना सा! और कोई नहीं! "कौन है तू?" उस स्त्री ने पूछा, अब अरुणा ने सब दुखड़ा सुनाया अपना! ...
उसने जो कुछ बताया, उसको मैं अपने शब्दों में ही लिख रहा हूँ, आप पढ़िए! पहले ज़रा उसके बारे में-- अरुणा की उम इकत्तीस बरस है, उसने अभी तक ब्याह नहीं किय...
"आपने कभी शुभागिनि का नाम सुना है?" बोला, "वो यक्षिणी?" पूछा मैंने, "हाँ, सुना है, शुभंगा? वही न?" कहा मैंने, "हाँ हाँ वही!" बोला वो! "उसकी खोजबीन?" प...
और हम अंगोछा बिछा, वही लेट गए! कम से कम यहाँ उनका कानफोडू गायन तो नहीं था! "अब परसों है आयोजन!" कहा मैंने, "हाँ, उसके बाद सीधा वापिस ही तो चलना है?...
चली गयी, और फिर हम इतने में ही गोपाल से मिले, और विदा ली, नंबर ले लिए गए थे एक दूसरे के, और इस प्रकार कोई ग्यारह बजे, हम चल पड़े ऋषिकेश के लिए! कोई पौ...
हम चले फिर उसके साथ! हम पहुँच गए बाबा जगत के पास! पाँव छुए उनके। उन्होंने गले से लगाया मुझे और शर्मा जी को! और बिठाया वहीं, सुश्री आदि कोई नहीं था वहा...
