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अब बाबा ने क्रिया की भस्म, फेंक के मारी अरुणा पर! अरुणा खड़ी हुई, उसको खड़ा होते देखा, बाबा हरु ने हाथ पकड़ लिया उसका! मेरा मन तो किया कि जाकर छड़ाइँ ...
आसपास देखा, तो एक जगह मुझे केली के पौधे दिखे, बन गया काम! मैंने आवाज़ दी शर्मा जी को, शर्मा जी और सुश्री भी आये मेरे पास, "हाँ जी?" बोले वो, "ये केली ...
पत्थर पड़े थे, उनसे बचना पड़ता था, बाबा तेवत और बाबा हरु, बार बार, उन सहायकों को लताड़ें, गाली-गलौज करें, आदेश दें ढूंढने के लिए! हम भी ढूंटें! कोई अत...
बना दिया था! "ये क्या कर रहे हैं?" पूछा सुश्री ने, "बहुत बुरा" कहा मैंने, "मैं अरुणा को समझाऊं?" बोली वो, "नहीं" कहा मैंने, "तो अब क्या करें?" बोली वो...
किसकी पुत्री? बाबा पुरुक्षा और माँ भवना की पुत्री? ये क्या सुन रहा हूँ मैं? ये क्या चक्रव्यूह है! मै इसी पृथ्वी पर ही हूँ न? कहीं और तो नहीं चला गय...
बस पाँव ही देख रहे थे उसके, पाँव भी ऐसे भारी कि छाती पर बस एक ही पाँव रखे, तो जीभ हलक से उखड़, बाहर आ जाए मुंह से! "अरुणा? पुत्री?" बोली वो, क्या ?...
वक्ष से, कभी हार्थों से और कभी उस अन्न से! प्रकाश यहीं से आ रहा था! देख तो लिया था हमने, लेकिन जैसे ज़मीन में धंसने वाले थे हम! ये स्त्री कौन है? औ...
तो जैसी आवाज़ होती है, वैसी, न जाने वो था क्या, कैसी आवाज़ थी, लेकिन आ हर तरफ से रही थी! और तभी प्रकाश फूटा! तेज प्रकाश! नीले और सफ़ेद से रंग का! म...
और अगले ही पल, वो अग्नि समाप्त! लोप हो गयी! रह गया तो मात्र उसका ताप! पेड़, पहले जैसे ही हो गए! कहीं ये किसी की आमद तो नहीं? लेकिन कौन? कामेषी? या स्व...
से निकलना ही बेहतर है, क्षमा मांगो और निकलो!" कहा मैंने, "नहीं!" बोले बाबा हरु! "विवेक से काम लो बाबा! नहीं तो प्राण संकट में हैं!" कहा मैंने, और त...
. . . . . . . हम जैसे ही बाहर आये, वैसे ही अचानक से कुछ आवाजें आने लगी! आवाजें, जैसे कहीं मंत्रोच्चार हो रहा हो! ये आवाजें ऐसी घन...
और ये, कक्ष किसका है? और ये त्रिशूल? कौन है इसका असली स्वामी? किसने बनाया ये स्थान ऐसा दिव्य? अब कान में सीसा सा घुलने लगा! पलकों पर जैसे मोम टपकने लग...
बोले शर्मा जी, "आओ तो सही?" कहा मैंने, आये वे, हए हम एक तरफ, "सुनो, अभी और भी कुछ बाकी है!" कहा मैंने, "क्या?" बोले शर्मा जी, "वो त्रिशूल!" कहा मैंने,...
और मैं, सुश्री और शर्मा जी, यहीं रुक गए थे! उस दीवार में, पेड़ों की जड़ें थीं, ये मैंने बताया था आपको, लेकिन ऐसी ही एक जड़ में, चांदी के कंगन से अड...
आयीं और गुजर गयीं! चीखते हुए! "इतनी सारी चीलें?" बोले बाबा तेवत! "हाँ जी!" कहा मैंने, "सारे जंगल की इकट्ठी हो गयीं शायद!" बोले वो, "लगता तो यही है!...
