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ओ-शौक़त, अपने असल रंग में आ जाने वाले थे! ये रंगीन पर्दे, मोटे मोटे कालीन, साज सजावट, फूल और तस्वीरें, सब ख़ाकसार हो जाने को थीं! यही सिलसिला दोहराया ...
और फिर चल पड़ा बाहर, बाहर, बनाओ मिली, इंतज़ार करती थी वो! "बनो, आतिरा से मिलवाइये?" कहा मैंने, "जी हुजूर" बोली वो, और ले चली मुझे, उस आतिरा से मिले...
आये थे, आगे बढ़ाई उन्होंने हमारे, मैंने चिलगोज़े उठाये, छीले और खाने लगा, वो चिलगोज़े आज के चिलगोज़ों से ज़्यादा बड़े थे, और स्वाद ऐसा, की खाओ तो घंटे...
मैंने, "नसीब वाली हैं ये!" बोले वो, मैं थोड़ा सा पशोपेश में! मुझे हैदर साहब से इस जवाब के तो कतई उम्मीद न थी! "क्या आपकी इजाज़त है?" पूछा मैंने, "आ...
सिलसिले को रोकने की?" पूछा मैंने, "मान जाएंगे?" बोले वो, "कह नहीं सकता!" बोला मैं, "तजवीज़ तो अच्छी है!" बोले वो, "बात करने में क्या हर्जा है?" कहा मै...
"न बन पड़े तो?" बोली वो, "तो ये लम्हात याद करना!" कहा मैंने, "या * * *ह!!" बोली वो, "और क्या?" कहा मैंने, "बताइये न?" बोली वो, "बताया तो!" कहा मैंने, ...
और ये खेल, मैं दिमाग से ही खेल रहा था। उस से बर्दाश्त नहीं हआ! खूब कोशिश की मुझे पकड़ने की, लेकिन मैंने अपने घुटनों की गिरफ्त से, उसके रिद फां को ऐसे ...
मैं ख़ास हँन?" कहा मैंने, मैं उसके अंदरुनी, जिस हिस्सा-ए-ज़हन पर चोट कर रहा था, मेरे सवाल का जवाब वहीं से आना था! "हाँ! आप ख़ास हैं!" बोली वो, और ल...
अपने आपको! अभी तक तो क़ायम था मैं! बस, टक्कर झेले जा रहा था! वहां का मतलब था वो पलंग, वो बिस्तर! मैं ले चला उसको, और ले आया बिस्तर पर, लिटा दिया उस...
बिना आग! दबाये, और मुझे देखे! और मैं उलझू! सुलझाये न सुलझं! मेरे खयाल और मेरे ज़ाम ही, मुझे कुचलें! मैं जाल में फंसे किसी परिंदे की मानिंद, फड़कता ...
अपनी पुश्त कर, और दुबारा से, जब को, अपनी रिद'फां से सताया, और भींच लिया! पकड़ लिया मुझे अपने हाथों से, और जैसे उठना चाहती हो, मुझे धक्का सा दे, पीछ...
और इस दफ़ा, मैंने पकड़ा हाथ उसका! और खींचा उसे! वो उठी, और सीधा मुझसे चिपक गयी! मुझे उठी झुरझुरी! और मेरे हाथ उसकी उस मुलायम देह पर, रेंग उठे! उ...
क्या मेजें, क्या कुर्सियां और क्या अलमारियां! कालीन बिछा था लाल रंग का, काले रंग के फूल कढ़े थे! "तशरीफ़ रखिये!" बोली वो, मैं बैठ गया एक कुर्सी पर!...
और उन रक्काशाओं ने, अपने अपने जिस्म को, आज़ाद कर दिया उस लिबास से! मैंने झट से जाम भरवाया अपना! अब छेड़ी बजाने वालों ने एक अलग ही ताल! ताल ऐसी, कि जैस...
और ले आई मीना, जाम और खाने को न जाने क्या क्या! कभी देखे भी नहीं, कभी सुने भी नहीं! खैर, हमने खाए, खूब खाए, ऐसे, कि जैसे पता नहीं कब के भूखे हों! औ...
