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और फिर वो समय आया! "अब जाओ! बढ़ जाओ आगे जुबैदा! बढ़ जाओ! एक नई सहर इंतज़ार करती मिलेगी! अँधेरा नहीं होगा वहां! जाओ! जाओ जुबैदा!" कहा मैंने, और मंत्र प...
रोना! कहा मैंने, "हम जानबूझकर नहीं रोते!" बोली वो, "तो फिर?" कहा मैंने, मुस्कुराते हुए, "हमें नहीं पता सच में" बोली वो, मैं मुस्कुराया, बेहद लज़ीज़ से...
और कतरा क़तरा वो धुआं! विलीन हो गया! आतिरा, मुक्त हो गयी! तीन सौ बरसों का वो अँधेरा, ख़तम हो गया! वो चली गयी! रह गए हम दो! उन लम्हों को याद करते हुए! ...
"और रिहाइश?" पूछा मैंने, और अब उसने मुझे अपनी रिहाइश के बारे में बता दिया! मैंने याद रखा, कभी जाना हुआ, तो मालूमात करा सकता था उसकी रिहाइश के बारे ...
आतिरा को मुक्त कर देने वाला था! शाम को शर्मा जी आये, सामान लेते आये थे, सहायक से इंतज़ामात करवाये, और हमने गिलास बनाये अपने, जैसे ही होंठों पर रखा गिल...
वो, "एक मिनट, वो जगह देखते हैं" कहा मैंने, "कौन सी जगह?" पूछा उन्होंने, "वो मालखाना!" बोला मैं, "अरे हाँ, आइये" बोले वो, और हम चल पड़े, रात में जहा...
"कल तक पुरसुकून नहीं था! आपके आने से हुआ!" बोले वो, कम अल्फ़ाज़ों में, सारा मतलब समझा दिया था! उन्हें इंतज़ार था किसी का! किसी का, जो उनकी फंसी हुई नै...
और खोलते खोलते, निकाले कुछ जले हुए कपड़े, संभाल कर! "ये देखिये साहब, कपड़े, जोहा के लिए खरीदे थे, हफ्ते भर बाद, घर जाना था मुझे, सभी के लिए कुछ न कुछ ...
और जल्दी से उठा, गटक गए वो, अपने हालातों से लड़ रहे थे अंदर ही अंदर! अपने जज़्बातों से! कितना मुश्किल होता है ऐसे लड़ना! न हार ही होती है, और न जीत ही...
और अब जाम बना लिए उन्होंने, एक मुझे दिया, एक शर्मा जी औ, और एक अपने लिए! सूखे मेवे थे, गोश्त था, कई तरह का! लज़ीज़ गोश्त! खुश्बू ही खुश्बू! तब मैंने प...
होंगे! या फिर महकमे के लोग! आज हवेली की शान-ओ-शौक़त लौट आई थी! ठीक वैसी ही, जैसे कल थी! "आइये" बोला वो, और हम चढ़े ऊपर! तभी रास्ते में, बानो मिली! ...
लिए! नहाना-धोना होता होगा, कपड़े भी धुलते होंगे! अलग अलग सूबों से लोग यहां आकर ठहरते होंगे! आराम करते होंगे! यहां भी, सरकारी मुलाज़िम तैनात होंगे, नौक...
और चला, आगे की तरफ, हवेली बहुत बड़ी थी! हमने तो एक चौथाई या एक तिहाई ही देखी थी! लेकिन अभी तो मुझे वो, हमाम देखना था! वहीं हमाम, जिसके पानी में पड़े इ...
सूबेदार साहब, वो महफ़िल, और ओहदेदार, वो कनीजें, वो आबिदा और वो मुलाज़िम, सब दफ़न हो गए! तीन सौ बरस! कलेजा काँप उठता है तसव्वुर करते ही! "यहां, शायद यह...
और फिर!! मैंने आँखें खोली अपनी! ये सहर थी! सहर आ चुकी थी! "आँखें खोलो!" कहा मैंने, उन्होंने आँखें खोली अपनी! और चौंक पड़े! हम, बीच खंडहर में खड़...
