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क्या किशोर, क्या स्त्री, क्या पुरुष, क्या प्रसूता, क्या वृद्ध किसी को भी नहीं छोड़ा गया! हज़ाररों कटे, हज़ारों मरे! कोई गिनती नहीं!" बोले वो, 'दोनों ह...
करेंगे!" बोले वो, "फिर?" पूछा मैंने, "फिर! बाबा खंज के कहने पर, वो उसको ससम्मान वापिस छोड़ने गया!" बोले वो, "कहाँ?" पूछा मैंने, "नीमड़ा!" बोले वो, ...
मायने?" पूछा मैंने, "यही, कि बाबा खंज कि बात टाल जाता था!" कहा मैंने, "तो दिन्ना किया क्या करता था?" पूछा मैंने, "लोहड़ बंजारे से मित्रता थी उसकी! उसी...
तिलिस्म से मुक्त रखा गया था, जैसा तुमने इच्छा की थी! तिलिस्म भेदने की कुंजी, तुमने इस साधक को दी, और ये साधक, निःस्वार्थ आगे बढ़ता रहा, भयहीन हो कर, इ...
परमोच्च सुंदरी भी क्षुब्ध ही रहेगी!" कहा मैंने, "हाँ! इस से नए सोपान चढ़ोगे!" बोले वो, "हाँ! जानता हूँ!" कहा मैंने, "और ये! तरुकिशा! वरण कर लो इन सभी ...
खिला रहे हैं! परख रहे हैं। और ये परख ही वास्तविक द्वन्द है! अभी तो शक्ति-परीक्षण था, इसके बाद न जाने और क्या क्या हो! हम एक वृक्ष ने नीचे खड़े थे, और ...
और आपको ऐच्छिक वस्तु या व्यक्ति दीख पड़ता है! लेकिन! इस बार ऐसा नहीं हआ! मुझे मात्र बादल ही दिखे! नीले आकाश में, सफ़ेद सफ़ेद बादल! मैं वापिस जा बैठ...
और चेतावनी भी दे डाली थी! और अगले ही पल बाबा ने गुस्से से, कुछ बोलते हुए, ज़मीन पर दी थाप! हम तो उछल गए! पीछे जा पड़े! शर्मा जी भी घेरे से बाहर आ गए! ...
क्या आज प्राण यहीं उड़ जाएंगे? मेरे संग, वे शर्मा जी भी? पसीने भी नहीं टपके भय के आगे! "मैंने कोई सौहिता भंग नहीं की बाबा!" कहा मैंने, "की है!" कहा उन...
और हम चढ़ पढ़े, करीब दस मीटर ऊंचा था वो, बड़ी मुश्किल से चढ़े हम, झाड़ियाँ पकड़ पकड़! ऊपर आये, तो एक चबूतरा बना था, गोले, बीच में एक गड्ढा था, छत अब न...
दे!" बोला मैं, "मुझे जैसल चाहिए, नहीं तो किसी को बख्शेंगा नहीं!" बोला क्रोध से! "जैसल नहीं मिलेगी तुझे दिन्ना अब! वो छूट चुकी!" कहा मैंने, "ऐसा नहीं ह...
जुड़ गए उसे देखकर, सर झुका दिया, एक अलग सा ही भाव उत्पन्न हो गया था! वो चली आगे, वे दूसरी स्त्रियां वहीं खड़ी रहीं, अब हम भी खड़े हो गए, अब हुए आमने-स...
और हम चल दिए आगे, बस हमारे जूतों की आवाज़ आ रही थी, या फिर मेरे बैग में रखे सामान की आवाज़! जो नज़र आया था, वो एक चबूतरा था, गोल बना हुआ था, उसके ऊ...
द्वादश-शाकंडी हैं! अत्यंत क्रूर, और महातामसिक! मानव रक्त और मानव मांस के लिए सदैव लालायित! इसकी इतनी हिम्मत? ये दवादश-शाकंडी प्रकट करे? अब देख औघड़...
"चलो" कहा मैंने, और हम चले! जितना आगे बढ़ें, तालाब, उतना ही दूर हो! "रुको! पीछे हटो!" कहा मैंने, हम हटे पीछे, उठायी मिट्टी, पढ़ी, और फेंकी, अब कोई ...
