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वापिस खताल जाओ!" कहा मैंने, "लेकिन...सुनिए?" कहा मैंने, नहीं सुना, और लोप हुए! "ये तो और उलझ गयी कहानी?" बोले वो, "हाँ, सच में अब तो" कहा मैंने, सामान...
थे वो! ये भी समझ से बाहर था! महक्ष! महक्ष के आवरण में कैद किया गया था उसे! लेकिन तब, बाबा खंज कहाँ थे? यदि वे जीवित थे, तो दिन्ना को आजाद करा सकते थे?...
पढ़ा और फेंक दी सामग्री आगे, पट-पट आग लगी घास में, और जैसे ही उन तक पहुंची, उसने त्रिशूल टिका दिया भूमि पर! आग बंद! मैंने तामूल-मंत्र पढ़ा, और थूका सा...
या सुलाया गया था सदियों के लिए! सामान लगाया गया, भोग भी रख दिया गया, धूपबत्ती आदि लगा दी गयी, एक बड़ा दिया लगा दिया गया, और लकड़ियाँ ला, उठा दी अलख! ...
से!" कहा मैंने, अब आया निकट हमारे, छाती पर दोनों हाथ धरे, इसका अर्थ था, कि वो कोई नुक्सान नहीं पहुंचाएगा! "कहाँ मिला था उस से?" बोला वो, "बाबा खंज की ...
दरमू ने मुझे आगे बढ़ाया था, मुझे अब यक़ीन हो चला था उन पर! वो मेरी मदद कर रहे थे, इसका अर्थ क्या था? यही कि कोई इस तिलिस्म को भेदे, मुक्त करे उन सबको!...
और अब बताया उन्हें कि क्या कहा था उसने मुझसे, "जैसल?" बोले वो, "हाँ, पता नहीं कौन है?" कहा मैंने, "चल जाएगा पता भी' बोले वो, "आओ, बावड़ी में देखें!" क...
की अभिमंत्रित! और चला उसकी तरफ! "रुक जा!" बोला वो, मैं रुक गया! "कौन है तू?" पूछा मैंने, "कामड़!" बोला वो, जल्लाद! जल्लाद था वो! ठहाका लगाया उसने! जां...
अब बस कंकाल मात्र बचे थे! एक भी वस्त्र नहीं था उनके शरीर पर! लेकिन रोने वाला तो कोई नहीं था वहां! आवाज़ फिर से आई! "वहाँ है!" बोले वो, और हम भाग लि...
और हम उनके ऊपर से ही चलते हए आगे बढ़ चले! जब आगे गए, तो एक चबूतरा मिला, उस पर इक्कीस कंकाल सजे थे, लाल रंग के, लेकिन अठारहवां नहीं था, आसपास गिरा भी न...
आँखें चमक उठी हमारी तो! मैं पत्थर बजाते बजाते थक गया था! पसीने छुट चले थे! "शर्मा जी, ये लो, यहां मारो!" कहा मैंने, और मैं पसीना पोंछने लगा अपना! श...
तो अब फोड़ डाला! उसमे से, एक पोटली निकली, काले रंग की, लोहे की बारीक तार से बनी थी और बंधी थी वो, "लोहे की तार?" बोले वो, "खोलते हैं" कहा मैंने, और...
और हमने फिर वो उठाये, उलटे पुलटे लगाये, फिर रेखाओं से रेखाएं जोड़ी, चिन्ह से चिन्ह मिलाये, जहाँ गलत जुड़े थे, वहां से ठीक किये, और फिर एक चित्र सा उभर...
और हम मुड़े पीछे, वहां कक्ष से बने थे, अँधेरा भी था, लेकिन एक कक्ष के भीतर से, प्रकाश आ रहा था! "यहीं है कोई!" कहा मैंने, और हम चल पड़े! मैंने अपना...
मत थीं सभी की सभी! शर्मा जी आये मेरे पास, उन्होंने भी देखा कुँए में, "ये ऐसे क्यों चीखीं? क्यों कूद गयीं?" बोले वो, "लगता है, कोई है यहां!" कहा मैंने,...
