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अब अधिक विश्वस्त और केंद्रित हो गयी! अर्थात वहाँ किसी की मौजूदगी थी! "श्रुति?" मैंने कहा, चुप! मैंने फिर से पुकारा! फिर से चुप! मैं ...
"उसने राजाओं के समान वस्त्र पहने हैं, आभूषण भी वैसे हैं" वो बोली, "अच्छा, इंसान ही है?" मैंने पूछा, "इंसानों से अधिक मजबूत, लम्बा-चौड़ा और ताक़तवर...
किसी भी पकड़ में नहीं था! घर भी सामान्य ही था, कुछ भी अलग या पारलौकिक नहीं था! अब जांच करना अत्यंत आवश्यक था! मैंने अब घर के सभी सदस्यों से...
अब अंदर गए हम, और बैठे, पानी पिया, और फिर अनुज के पिता से मुलाक़ात की, चेहरे पर सूजन थी उनके, पूरे घर में मुर्दानगी सी छायी थी! किसी ...
और हमारा कार्यक्रम हो गया निश्चित, कल हम निकलने वाले थे वहाँ, आया वो दिन, अगला दिन, और हम उनको फ़ोन करके, निकल गए, रास्ता साफ़ मिला, ...
कौन सी? जो इबु को भी भेज दे? इबु आ जाए, बैरंग! खाली हाथ! जिसे मैं प्रेत समझ रहा था, वो न तो प्रेत था, न ही जिन्न! तो फिर क्या?...
"हाँ जी" वे बोले, "तब से कैसी है वो?" मैंने पूछा, "अनुज ने बताया कि तब से उसने कुछ नहीं कहा है, लेकिन स्थिति वैसी ही है" वे बोले, अब ये चिंता...
शर्मा जी वहीँ थे, "कोई प्रेत लगता है" वे बोले, "हाँ, यही है" मैंने कहा, "चलो अब पता चल जाएगा" वे बोले, "हाँ" मैंने कहा, फिर हमने चाय पी...
सामने नहीं आता? मतलब डरता है? मैंने सोचा, विचार किया, और फिर एक धागा बना दिया, "ये लो, ये बाँध देना उसके हाथ में, फिर बताना मुझे" मैंने...
वे एक तरफ चले गए, मैं समझा, कोई विशेष बात होगी, "गुरु जी, दो महीने से वो कहती है कि वो जो आता है उसके पास, वो उसके साथ संसर्ग करने की ज़िद करत...
ये कोई लपेट का ही मामला लगता था, काहिर, आगे बातें हुईं फिर! अजीब सी बात थी बहुत! "क्या कहती है? कोई दीखता है?" मैंने पूछा, "हाँ जी" वे बोले...
उस दिन शुक्रवार था, समस्या उनके बड़े बेटे की नव-विवाहित पत्नी के साथ थी, शादी को अभी छह महीने ही बीते थे! और फिर इतवार आया, दोपहर से पहले व...
इसीलिए, उस दिन, इस अंग्रेजी शराब में खूब मजा आया था! आत्मा प्रसन्न हो गयी थी! देसी शराब से छिटके, अपने याड़ी लोग भी, पास आने लगे थे! ...
और फिर हम पहुँच गए दिल्ली! दो दिन तो कमर सीधी करने में लग गए! लेटो, तो लगता था, अभी भी गाड़ी में ही सफर कर रहे हैं! ऐसे झटके लगते थे! ...
सामान रखा, और फिर चाय पी, साथ में वहाँ जो मिला, खा लिया! गाड़ी रात में दो बजे के आसपास थी, प्रतीक्षा करने के अलावा और कोई रास्ता नहीं था! ...
