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घर में, एक रिश्ता आया,रिश्ता उसकी बड़ी बहन के लिए!रिश्ता बहुत बढ़िया था!यदि बात बन जाती, तो उसकी बड़ी बहन के भाग बन जाते!घर-परिवार बढ़िया था!तिजारती लोग थ...
"आता हूँ अभी!" बोला वो,और खोला घोड़ा,ले चला, उन पेड़ों के पास,उधर था कुछ पानी, मवेशी पी लिया करते थे,"सुन?" बोली गीता,"हाँ?" बोली रूपाली,"अब शरमाना नहीं...
बस जो थोड़ा बहुत पानी था, वो मवेशी या घोड़े आदि पी लिया करते थे,भर दिया करते थे लोग बाग़, या औरतें उसे,खैर, वे दोनों वहां पहुंचीं,और जा बैठीं एक जगह,ये प...
मुस्कुराये!करवटें बदले!रात के प्रहरी, झींगुर और मंझीरे,जैसा उसका मनोभाव समझें!उसकी के भावों में,अपने सुरों की ताल दे दें!बड़ी मुश्किल से रात काटी!एहसान...
"जान बचा ली इसकी आपने!" बोली छेड़ते हुए रूपाली को!मुस्कुरा पड़ा!"कल, दोपहर बाद, बड़ी बावड़ी.......!" बोली वो, और बता दिया गाँव का पता!मुस्कुराया!"आऊंगा! आ...
अनुभव क्र ९६ भाग ३ आया, घोड़ा बाँधा अपना,और चला उनकी तरफ! तेज क़दमों से!आया, हांफता हुआ!मिली नज़रें दोनों की!अपलक देखा उन्होंने एक दूसरे को!"रूपाली?" ब...
गीता की आँखों में भी, पानी छलक आया उसको देखकर,अब कुछ कहना ठीक न लगा उसको, रूपाली से!उठायी पोटली,और पकड़ा हाथ रूपाली का,आँखों में देखा,आँखें डबडबा रही थ...
जहाँ घोड़े बंधे थे!खोला अपना घोडा!चारे की थैली, हटाई मुंह से उसके,रखी जीन के पास,और अब कसी जीन उसने!उठायी चारे की थैली,बाँधी जीन से,मुश्क़ की जांच की, प...
जो अक्सर हुआ करती है, कि तू ये और मैं ये!आखिर में, गीता पड़ी भारी!और हुआ तय, कि अब रूपाली बात करेगी उस से!अब शर्म, छोड़नी ही होगी!नहीं तो, आज का दिन, आख...
इस जवाब से तो,रूपाली के क़दम डोल पड़े!पसीना आ गया पांवों के तलवों में!हाथ, काँप उठे!वो कपड़ा, पूरा आ गया मुंह पर!"फ़र्क़ पड़ता है!" बोली गीता!"बताओ आप? क्या...
"मैं, अकेला!" बोली वो,"अकेले क्यों?" पूछा गीता ने,"अकेला ही रहता हूँ!" बोला वो,"माँ-पिता, बहन, भाई?" पूछा गीता ने,"वो बहुत दूर हैं!" बोला वो,दूर! बहुत...
चमचमाता चेहरा!खूबसूरत वस्त्र!जो गुजरता, उसे अवश्य ही देखता!आज बहुत से सरकारी मुलाज़िम आये थे वहां!आक मेले का आखिर दिन था,कोई झगड़ा-फ़साद न हो, इसलिए!वे च...
सच में ही, नींद कहाँ आई थी सारी रात!कई बार जागी थी!पूरा बिस्तर ही नाप दिया था उसने!"दो दिन बाद गीता?" बोली रूपाली,"मेला खत्म!" बोली वो, हंस कर!शांत वो...
सब्जी-भाजी काटी,बड़ी बहन बना रही थी भोजन,उसको दीं सब्जी-भाजी!और चली आई छत पर, सूरज धीरे धीरे बढ़ते चले आ रहे थे!छत पर ही, लाल मिर्चें सूखी थीं, कुछ और भ...
उन्ही के घोड़ों की टापें थीं वो!बंद किया दरवाज़ा,चढ़ा दी सांकल,और करने लगी काम!मन फिर से छलांग मारे!दौड़ के भागे उस रास्ते पर!ढाढण की हवेली पार करे!और तेज...
