वर्ष २०११ असम की एक...
 
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वर्ष २०११ असम की एक घटना

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(@prashantdhumal)
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Posted by: @1008

मानव का कलेजा,
ग्यारह रात्रि,
इसका ही भोग दिया जाता है!
ये तावक नाथ,
सरभंग क्रिया में भी निपुण था!
मुझे हैरत थी!
सच में ही हैरत!
मैं भागा अलख तक,
और जा बैठा,
"कपालरुद्रा!" स्वर गूंजे!
और मैंने तब भोग-थाल सजाये,
मदिरा परोसी!
और लगा आह्वान में!
अलख में भोग अर्पित किया!
और इस बार, अपनी नस से, रक्त का भोग भी दिया!
ये कपालरुद्रा का आह्वान-भोग है!
तो इस तावक नाथ ने भैलकण्टा का आह्वान किया था!
और मैंने कपालरुद्रा का!
समकक्ष हैं दोनों ही!
परन्तु, कपालरुद्रा महाबलशाली है!
सागौन के वृक्ष पर इसका वास है!
ये, अत्यंत रूपवान बन प्रकट होती है!
प्रबल रूप से कामुक है!
अच्छे से अच्छा साधक भी, स्खलन का शिकार हो जाता है!
व्यूत्-क्रिया से संतुलन बनाया जाता है!
ये क्रिया कोई भी कर सकता है!
इस से स्तम्भन हो जाएगा,
और जननांग सुन्न हो जाएगा,
जब तक आप दही न खाएं तब तक!
यही 'सुप्तावस्था' में किया जाए तो कारगर है,
अन्यथा, नसों में भारी दर्द होता है!
आप समझ सकते हैं!

[/quote ]व्युत क्रिया कैसे करते हैं

 


   
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श्रीशः उपदंडक
(@1008)
Member Admin
Joined: 2 years ago
Posts: 9500
Topic starter  

@rajeshaditya मुझे व्हाट्स एप्प पर msz कीजिये


   
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