Last seen: May 13, 2026
"मैं अबोध हूं हे देव!" बोली वो, मन ही मन,अबोध! निर्बोध नहीं यस्था! आये फिर से स्वर! चंद्रदेव, जैसे, समझा ही रहे थे यस्था को!"निर्बोध?" कहा उसने,हां! न...
"अब वक़्त हो गया!" बोली वो,"कहां का?" पूछा मैंने,"घर का?" बोलीं वो,मैंने बाहर झांका, वक़्त का तो पता ही न चला! मैं तो उसी आश्रम में, उस कक्ष में, उस गौ-...
"आ?" बोली मां,और यस्था का हाथ पकड़, बाहर ले चली!"मां?" बोली वो,"हां?" बोलीं वो,"बरसात है?" बोली वो,"तो कौन सा दूर जाना है?" बोलीं मां,अब न सुनी एक भी, ...
"वैसे मैं भी अभी किसी नतीजे पर नहीं पहुंचा हूं अम्मा!" कहा मैंने,"अभी तो वक़्त है!" बोली वो,"कब तक?" पूछा मैंने,"कुछ अधिक!" बोली वो,"कितना फिर भी?" पूछ...
इतना बता अम्मा चुप हो गयीं! मैं, घोर व्याकुलता से उनके आगे के शब्दों को सुनने के लिए बेचैन था!''अम्मा?" कहा मैंने,अम्मा ने कोई जवाब नहीं दिया!"अम्मा?"...
"सही बात है अम्मा!" कहा मैंने,''वो बेचारी!" बोली वो,"हां!" कहा मैंने,"कितना खिसकती!" बोली वो,"हां, समझ आता है अम्मा!" कहा मैंने,"वो बेचारी, टकटकी लगाए...
अम्मा चुप ही रहीं! जैसे घटना को, उस गीत से जोड़ रही हों! या उस गीत का आशय, गूढ़ आशय कम ही शब्दों में, पूर्ण रूप से समझ आ जाए!"उस संध्या, अम्मा?" पूछा मै...
और फिर अम्मा ने, वो लोकगीत गुनगुनाना शुरू किया! उनके गुनगुनानेसे मुझे बड़ा ही सुकून मिलने लगा था, मुझे लगता था, कि कहीं न कहीं, देर से, अवेर से ही, मैं...
"ये गाथा अवश्य ही कुछ संकेत तो देती है!" कहा मैंने,"तभी जीवित है!" बोले वो,"निःसंदेह!" कहा मैंने,फिर उसके बाद, हम वहां से वापिस लौट आये, भोजन किया और ...
"महंत जी?" कहा मैंने,"जी?" बोले वो,"एक बात पर ध्यान दिया?" कहा मैंने,"वो क्या?'' बोले वो, कुछ जिज्ञासा से!"ये बात तो सभी को ज्ञात ही होगी कि नीचे जल ह...
अम्मा तो चली गयीं! लेकिन मुझे एक खाई में धकेल गयीं! एक ऐसी खाई, जिसमे अंदर तो आ सकें लेकिन बाहर का कोई रास्ता न हो! जिज्ञासा की ऊंची ऊंची सी दीवारें औ...
बाहर भले ही शीतल हवा चल रही थी परन्तु, मन के भीतर एक धौंकनी भी चल रही थी! वप चलती, सांस लेती और कोई नाम सा लेती थी, नाम क्या था, सुनाई नहीं पड़ता था सा...
(चाहे देख कर अनदेखा ही जो कर दो! चंद्रदेव से कुछ छिपा नहीं! कब करवट बदली, कब प्यास लगी, कब आंख खुली और कब, तन सोया और मस्तिष्क जागा! वे तो मंद मंद मुस...
वो दौड़ी, तेज और तेज, हांफते हुए, अपने कक्ष में आ गयी! सांसें बंधी और उसने, बांस की बनी उसी जाली से बाहर झांका! हंदल ने वो अंगोछा ओढ़ा नहीं था, बल्कि अप...
"तभी नहीं जा पाया होगा?" बोला मैं,"हां!" बोली वो,"वहीँ रुक गया फिर!" बोला मैं,"हां, मुनि पौष, दवा देते उसे!" बोली वो,"अच्छा! समझा!" बोला मैं,"लेकिन यस...
