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और उसका श्रृंगार किया पुनः!माँ कपालरुद्रा का आगमन हो रहा था! इसीलिए!और तभी चौम-चौम की आवाज़ आई!हर तरफ से, हर कोने से!ये भैलकण्टा का आगमन था!वो उधर प्रक...
"औंधिया?" चीखा मैं,एक दीया बुझा, और फिर जला!"आ! आ औंधिया!" बोला मैं,और दिया उसे भोग!एक प्रबल अट्ठहास!मसान हँसे, तो बल मिलता है!हुआ मैं खड़ा! और किया, श...
कि मरे सामने हो वो तो,गरदन ही मरोड़ दूँ उसकी!कलेजा चीर दूँ!तिल्ली निकाल,कुत्तों को खिला दूँ,नेत्र निकाल, चीलों को खिला दूँ!दिल निकाल, चींटियों को खिला ...
और घुसेड़ा त्रिशूल उसके पेट में!खून का फव्वारा फूट पड़ा!क्रोध ऐसा कि मैंने उठा ही लिया उसको त्रिशूल से!ले चला पीछे!और निकाला त्रिशूल,वो गिरा नीचे,उसके प...
ये क्रिया कोई मुश्किल नहीं,मात्र सात दिनों में ही पूर्ण की जा सकती है,इस क्रिया से, आपको कोई भी स्त्री स्खलित नहीं कर पाएगी!अनुभूत क्रिया है!कई मित्र ...
मानव का कलेजा,ग्यारह रात्रि,इसका ही भोग दिया जाता है!ये तावक नाथ,सरभंग क्रिया में भी निपुण था!मुझे हैरत थी!सच में ही हैरत!मैं भागा अलख तक,और जा बैठा,"...
और लगा आह्वान में!अलख में भोग अर्पित किया!और इस बार, अपनी नस से, रक्त का भोग भी दिया!ये कपालरुद्रा का आह्वान-भोग है! अनुभव क्र. ९२ भाग ६नाच उठा! झूम...
और मारा ठहाका!"तेरी मुण्डवाहिनी!" कहा मैंने,वो खड़ा हुआ,उठाया त्रिशूल अपना!और दौड़ चला एक तरफ,वहाँ जाकर, बैठा,त्रिशूल गाड़ा,फिर उठा, भागा,आया अलख तक,और ए...
उड़ चला वहां से!सीधा वहीँ गिरा!तावक नाथ ने उठाया सर,पढ़े मंत्र,और फिर फेंका हवा में,वो फिर से मेरे यहां गिरा!इस बार भी रोते हुए!अब कुछ न कुछ करना था!मैं...
उसपर दीया रखा,उखाड़ा त्रिशूल अपना,चला दूर तक ज़रा!त्रिशूल को नीचे भूमि पर लगाया,और मंत्र पढ़ते हुए, एक बड़ा सा घेरा बनाया,इतना बड़ा, कि वो सर हमारे पास न ग...
दिखाया मुझे,उसका मुंह खोला,और जीभ निकाली बाहर,जीभ पकड़ी,और झुलाया उसको!फिर मारा ठहाका उसने!"ये! ये भाजन करेगी तेरा!" बोला वो,मैं ज़रा सोच में पड़ा!ये तो ...
मैं उठा!भागा अलख की तरफ!और कपाल कटोरे में मदिरा परोसी!गटक गया एक ही बार में!उठाया त्रिशूल अपना!और चला आगे!कपाल भी उठा लिया,रखा बगल में!और आगे जाकर, रख...
मध्यान्ह में दो बजे से, चार बजे के मध्य,त्याजित श्मशान में इसकी साधना होती है,ग्यारह रात्रि साधना काल है,साधक अब वहीँ का हो कर रहता है,उस श्मशान से बा...
ग्यारह महाभीषण शाकिनियों द्वारा सेवित है!देह में छरहरी,आयु में नव-यौवना,स्वर्णाभूषण धारण किये हुए,मुण्डमाल धारण करती है,शेष देह, नग्न है,स्तन दीर्घ है...
मेरे यहां प्रकट हुई, मैंने हाथ जोड़े, नेत्र बंद किये,और तीव्र वेग से, वो भी लोप हो गयी!मेरा वार खाली गया था!अट्ठहास गूँज पड़ा उस तावक नाथ का!नाचने लगा थ...
