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"और आप बताओ!" बोले वो,"क्या?" पूछा मैंने,"सब ठीक चल रहा है?" पूछा उन्होंने,"हाँ, सब ठीक!" कहा मैंने,"यही चाहिए, और क्या!" बोले वो,"हाँ, उचित तो यही है...
"रिपुना?" कहा मैंने,"नहीं...नहीं....!" बोली वो,"क्या नहीं रिपुना?'' पूछा मैंने,"सब की वजह मैं ही हूँ, मैं!" बोली वो, रोते रोते!"नहीं रिपुना!" कहा मैंन...
अब मेरी साधिका में दो भाग थे! एक, वो साधिका थी, दूसरी वो एक स्त्री थी! ये दोनों ही अति-आवश्यक थीं मेरे लिए! स्त्री, जिसको मैं संसर्ग में भागी बना रहा ...
और तब हुई जांच आरम्भ! मैंने जांच के सोलह प्रकार जाँचे, सोलह में से, चौदह में वो परिपूर्ण थी, शेष दो रह गए थे, उनको, अब इन दो दिनों में पूर्ण करना था! ...
मित्रगण! मुनि वात्स्यायन ने काम-सूत्र की रचना की! उन्होंने काम के विषय में लिखा, अवश्य ही लिखा, बाद में टीकाएँ भी हुईं! परन्तु वो सभी काम को परिभाषित ...
विरामावस्था! हाँ! हम सभी इसी अवस्था में हैं! जिसने त्याग दिया इसे, वो सिद्ध हुआ! नहीं तो चाकी का पाट! जहां से चले, वहीँ आ गए! अन्न ही पीसते रहे गए! अन...
ब्रह्मांड का दर्पण! हाँ! अब दर्पण ही क्यों? सरल है न? दर्पण असत्य न बोले कभी! जो सामने, वो दिखाए! अब जो छुपाये, तो क्या छुपाये! मूर्ख ही छिपा सके बस! ...
फूंक! सच कहूँ तो कैसी कैसी होती है फूंक! एक फूंक जहां सीरी, ठंडी और आरामदेह होती है और एक, जिसमे अगन भरी होती है! वाह रे बनाने वाले! इंसान कभी तो आएगा...
"साधिके?" कहा मैंने,"जी?'' बोली वो,"जो मैं सोच रहा हूँ क्या वही है?" कहा मैंने,"जी!" बोली वो,"आज प्रथम-रात्रि है!" कहा मैंने,"ज्ञात है!" बोली वो,"कोई ...
"साधिके?" कहा मैंने,मैं अब पूर्ण उत्तेजना में था! त्रैरात्रिक-वधु साधना का यही आरम्भ था! ये प्रबल-काम साधनाओं में से एक है! इसका लाभ क्या होगा, ये मैं...
उसने मदिरा-पात्र उठाया और अपने होंठ, चेहरा धो लिया, कालिख उतर तो गयी थी, लेकिन बहते हुए कजरे की तरह से, पूरा चेहरा कजरारा हो गया था! अब दिखने में और क...
काहुँड! दैवीय-क्षेत्रपाल! अति-प्रबल! महाभीषण! मोहन का विध्वंसक चेवाटों का प्रमुख शत्रु! वज्र-घन्टाल से पूजित! और सौ महा-प्रेतों द्वारा सेवित! देह में ...
निधि-सुंदरी का गमन हो ही चुका था, रुषि का तुण्ड-महाविद्या द्वारा प्रभाव समाप्त किया जा चुका था! मेरी साधिका भूमि पर लेट गयी थी, मेरे बुलाने पर भी, वो ...
वो वायु प्रवाह गुज़र गया था! निधि-सुंदरी का वो प्रभाव, तुंड-मेखविद्या ने प्रभावहीन कर दी थी! निधि-सुंदरी से तो छुटकारा मिल ही गया था, अब, आगे भी कुछ ऐस...
और इस तरह, मैंने धूमरि लगाते हुए, अलख उठा दी! अलख उठाते ही एक अलखनाद किया! मेरे पीछे पीछे मेरी साधिका ने भी अलखनाद किया! और दोनों हाथों से, ईंधन झोंक ...
