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“आज भी पुष्प एकत्रित करने आयी हैं?” विपुल ने पूछा! “ह…हाँ!” इथि ने कहा, झूठ! फिर से झूठ! “कर लिए?” उसने पूछा, “हाँ” उसने कहा, एक और झूठ! ...
घर आयी! अनाज फटकारा! और अब हुआ मध्यान्ह! भागी तीर की तरह घर से पल्ली के पास! पल्ली पहले से ही थी तैयार! चल पड़ी इथि के संग! इथि आगे आगे और ...
अलख जगी! अलख जगी आँख खुलते ही इथि के सीने में! भागी बाहर! माँ उसके व्यवहार से परेशान! पिता और भाई हैरान! ये क्या हुआ अचानक इथि को? तीन दिन...
अब तो फिर से प्रतीक्षा! दो गुना बेसब्री! कल की! यही तो होता है! कोरे कागज़ पर एक छोटी सी स्याही की बूँद भी अपना अस्तित्व ज़ाहिर कर दिया करती है!...
“बताया था” इथि ने कहा, “फिर? कहाँ थी” पिता ने अब प्रेम से पूछा, “पल्ली के साथ” उसने कहा, “किसलिए?” पिता ने पूछा, “वैद्य के पास जाना था, सो मैं...
इतना बोझ! इतना बड़ा एहसान! मर गयी इथि! मुड़के वो मुस्कुराया भी था! धम्म! बैठ गयी इथि जस की तस! अब खोए सच में होश! हो गया रिक्त संज्ञान-कोष...
इथि ने देखा! सखी ने देखा! वे आये और ठहर गए! विस्मय! “आपको पुष्प नहीं मिले?” विपुल ने इथि से पूछा, “मि…मिल गए” संकुचाते बोली इथि! “फिर? किस...
ये तो सीधे आते हैं, चले जाते हैं, परदेसी भी हैं, इन्हे कैसे पता? और फिर? यहाँ पुष्प कैसे? कहाँ से आये? ये क्या माया है? ऐसे ऐसे कई प्रश्न! ...
“आइये” विपुल ने कहा, वे संकोच में खड़ी रहीं! “आइये? संकोच न कीजिये, वहाँ पुष्प ही पुष्प हैं!” विपुल ने कहा, वे चल पड़ीं उसके पीछे! और मित्रगण! ...
फिर? प्रश्न-चक्र घूमा इथि के मस्तिष्क में! अब दोनों सखिया चुप! चुप वे भी! “आप किसलिए आती हैं यहाँ?” विपुल ने पूछा, पल्ली को ऐसे प्रश्न की आश...
बड़ी अजीब सी मुसीबत! कहीं बुरा न मान जाएँ! “क्या आप यहीं रहती हैं, आस पास?” सुचित ने पल्ली से पूछा, “जी, वहाँ, वहाँ है हमारा गाँव, हम वहीँ रहती ह...
अब कैसे हो? कैसे बात बने? कैसे ज़ाहिर करे? बड़ी मुसीबत! खैर, सूर्यदेव ने बताया कि मध्यान्ह होने को है! आने वाले हैं वो परदेसी! ह्रदय धक्! ...
रात्रि आयी! विकट गुजरी! भोर हुई! आँखों में ही सबकुछ हो गया! प्रहर बदल गए! कोई आने वाला है! सुबह! कुछ सोचा और सुबह सुबह ही निकल पड़ी इथि! ...
प्रेम भड़क जाये तो हाल खराब ही होता है! अर्थात उचाट देता है दीन-दुनिया से! मैं मैं नहीं रहता और वो और वो हो जाया करता है! जी उचट जाता है! यही हुआ इथि क...
उच्च घराने के व्यवसायी! तेरी क्या बिसात! तू है क्या? तेरा प्रेम क्या है इथि? मिथ्या-भ्रम! और कुछ नहीं! और तभी! नेत्र से प्रेम के आंसू गि...
