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और जाने लगा पीछे! कुछ अहित नहीं किया उसने हमारा! हम सर्पहन्ता नहीं थे, न पकड़ कर, कैद ही कर रहे थे। हम तो मात्र गौंच-दर्शन हेतु आये थे! बस यही उद्देश्...
रहे थे सफेद रंग के! अंदर को मुड़े हए दांत! जैसे ही कोई अंदर आने का प्रयास करता, झटका खा, पीछे फिंक जाता! मैंने फिर से त्रिशूल उठाया, अलख पर रखा, मंत्र...
बाबा का त्रिशूल ले आया था मैं, और दो मीटर काला कपड़ा भी! कुछ सामग्री, और शराब भी, उस घेरे में, मैंने सबसे पहले प्रवेश किया, फिर कौशुकि ने, और फिर श...
ने, एक बार और सामग्री ली, और फेंकी उस सर्प पर! आश्चर्य! उसे कुछ न हुआ! वो जस का तस ही रहा! अब ज़रा सकपकाई कौशुकि! लेकिन फिर भी न हटी! एक मनका निकाला उ...
"मैं यहीं रहूंगी" बोली वो, "यहां प्राण-संकट है!" कहा मैंने, "कोई बात नहीं" बोली वो, "नहीं कौशुकि, जाना होगा" कहा मैंने, "नहीं!" बोली वो, और चल पड़ी...
हवा तेज हो चली थी बहुत! धूल उड़ने लगी थी, मैं और शर्मा जी, एक बड़े से पत्थर की आड़ ले, बैठ गए थे। वेदिका का शमन हो चला था, हवा ने टिकने ही न दिया थ...
दो गड्ढों पर, चटक-चटक की आवाज़ हुई! लेकिन वो गड्ढे छोटे थे, कोई चार गुणा चार फ़ीट के, वे मुहाने नहीं हो सकते थे, और जो आवाज़ आती थी चटक-चटक की, वो विद...
सर झुकाएं पीछे, काटने की धमकी दें! अब कुछ विकल्प शेष नहीं बचा था मेरे पास! मैंने तब, वो मिट्टी फेंक मारी साँपों पर! हवा में उछल गए वे! बहुत सारे! औ...
हुआ?" पूछा कौशुकि ने, "नहीं आया वापिस" कहा मैंने, "इसका मतलब ये हुआ, कि कहीं और भी रास्ता है!" बोले शर्मा जी, बात तो सही थी, ऐसा ही लगता था! "आओ ज़रा ...
डाल पर बैठा होये नीलकंठ, उसके उड़ जाने के बाद, उस डाल को तोड़ लो, घर में दीवार पर टांग लो। लक्ष्मीजी, बार बार रास्ता भूल आपके घर ही पधारेंगी! ये ता...
अब हम थोड़ा दूर हो गए थे उस से! वो पलटा अब! हआ मेरी तरफ! बढ़ा थोड़ा सा आगे, मैंने हाथ झटकाया अपना! वो रुका ये देख! अब वो शर्मा जी और कौशुकि पर नज़र नह...
और जब मैंने समझाया तो! तो एक पल को घबरा गयी वो! रंग उड़ गया चेहरे का उसके! तभी वो सर्प, आगे बढ़ा! जा रहा था आगे, मैंने एक पत्थर उठाया, और मारा उसको...
चम्मच सिरके में डाल कर, सिरका घर के बाहर फेंक दें,खबर मिल जायेगी! यदि नीच के शनि, नीच के सूर्य और नीच के शुक्र पीड़ित कर रहे हों, तो शनि के लिए, दो धा...
और बैठ गयी वो वहीं! और हम, उसकी देख-रेख करते रहे! उसने न जाने क्या क्या फेंका उस गड्ढे में! डाले और राख हो! फिर डाले, फिर राख! आधा घंटा बीता! अब तो...
और सो गए इस तरह हम! हवा का ज़ोर बहुत था! तम्बू फ़ड़फड़ा जाता था हवा से! खैर, सोही गए थे। रात करीब डेढ़ बजे, चीख-पुकार सी मची! हम उठे! बाहर झाँका! ...
