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जोधराज! बाबा सरूप! दोनों थे वहाँ! अलख भड़की थी! दो मेढ़े खड़े थे, बंधे हुए! थाल, दीप, दरी, भोग-पात्र, सब था वहाँ! तभी उसने देख पकड़ी...
और फिर महानाद! और अलख उठा दी अब! अलख भोग दिया, अलख लपलपाई! और भोग! फिर उस घाड़ को सीधा किया, और बैठ गया उसके ऊपर, अब आह्वान किया! वाचाल...
भोग-थाल, दीप, आसन, सभी कुछ! और फिर गया मैं अपने जानकार के पास, घाड़ आ चुका था! ये एक पच्चीस-तीस वर्ष की आयु का घाड़ था, देह सही थी उसकी! ...
जैसा शर्मा जी कहें, वैसा ही करना” मैंने कहा, “ठीक है” वो बोली, मुंह से हाँ, और अंदर से न! “मेरा द्वन्द होगा आज, मैं सात बजे से मौन-व्रत में रह...
प्रबंध कर दिया था, हाँ, वो घाड़ आठ बजे आना था यहाँ, बस वही था, जिसका इंतज़ार था! सामान-सट्टा सब देख लिया था मैंने! सब सही था! मैं कमरे में...
मैं खड़ा हो गया था! वो मेरी इनमे से कोई भी नहीं थी! न मित्र, न प्रेयसी! परन्तु, उनसे कहीं अधिक! एक परदेसी! और उसका विश्वास! ये था एक मा...
बहुत हल्का! बहुत महीन होता है ये विश्वास! एक बार जो टूटा, तो जुड़ेगा नहीं! चाहे कुछ भी कर लो! चाहे क्षमा ही मांगो! चाहे आंसू बहाओ! नहीं ज...
मदिरापान किया! और सो गए हम! हुई सुबह! आज दशमी थी! आज ही था द्वन्द! आज जोधराज और मुझे टकराना था! ऊँट किसी भी करवट बैठ सकता था! यहाँ भी, ...
बैठा, वो भी बैठी! खुश थी! “एस्टेला!” मैंने कहा, “हाँ?” वो बोली, “भारत में ऐसी बहुत जगह हैं, जहां श्रद्धा टूट के पड़ती है, किसी भी कोने में चल...
कि डांट खानी पड़ेगी मेरी! इसीलिए! देख लेती थी हमको! बार बार! फिर आयी! कुछ जानकारी का आदान-प्रदान हुआ उनके बीच! और फिर आ गयी! बैठ गयी! स...
कभी फिर उल्लेख करूँगा! अब फिर से ज़िद पकड़ ली एस्टेला ने! घाट पर जाने की! फिर से जीत गयी वो! जाना ही पड़ा! शर्मा जी को साथ लिया, और चल पड़े! ...
कि प्रत्येक पदार्थ में, ऊर्जा समाहित होती है, ऐसे ही मंत्र, मंत्र भी शक्ति पैदा करते हैं, ये मंत्र युग्म में हों तो, महा शक्ति हो जाया करते ...
और चल दिए अपने कक्ष की ओर! वहाँ गए, और बैठे! बाबा ने चाय भिजवा दी, हमने चाय पी, उसके बाद, मैं ले गया उसको बाहर, कक्ष के, आसपास घुमाया, ...
वो मुझे देखते रही! मूर्ति सी बनी! और फिर मैंने एक एक करके, सभी मंत्र और विद्याएँ जागृत कर लीं! मुझे तीन घंटे लगे! फिर से नमन करने के पश्चात,...
मैं खड़ा हुआ, वो भी खड़ी हुई, “आओ” मैंने कहा, “चलो” वो बोली, हम चल पड़े! मैं क्रिया-स्थल गया! अलख बुझी हुई थी! मैंने अब ईंधन डाला उसमे, औ...
