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अब समझ गया! अक्सर आदिवासी औरतें और पुराने समय की स्त्रियां पहना करती थीं ऐसा हंसा और हंसुली! समझ गया मैं! क्या है हंसा! उस जले हुए हंसा का मतल...
और इस तरह हम अगले दिन सुबह ही सुबह रवाना हो गए दतिया से! दतिया पहुंचे और मैंने अपने जानकार मलंग नाथ से बात की, मलंग नाथ खुश हो गया हमको देख कर, वो प...
"हाँ, या तो झाँसी या फिर ओरछा" मैंने कहा, "अब?" वे बोले, "अब पता करना होगा, कि आखिर बरहु के साथ क्या हुआ? उसके बालक कहाँ गए? और ये कैला? ये अलग कै...
"आइये शर्मा जी" मैंने कहा, वे मेरे साथ चल पड़े, हम अपने कमरे में पहुंचे, मैं अपनी पुश्त पर लेट गया, हाथ दोनों सर के नीचे लगाया! "कुछ पता चला?" ...
प्रेत-मंडल में ग्रस्त! वो आगे चली, बिना मुझे देखे, मैं वही एकटक उसको देखता रहा, वो बार बार झुकती, कुछ उठाती! हाँ! हंसा! यही उठाती जाती! वो आ...
उसने इशारा किया, चारों तरफ! समझ गया! वो भटक रही थी! किसी की खोज में! अनजान! हकीकत से अनजान! एक अनजान रूह! मुझे जैसे मोह हो गया उस कैला स...
कपडे झाड़ते हुए! "मार डालते" उसने धीरे से फुसफुसाया! मार डालते? कौन? यहाँ तो कोई नहीं? "कौन मार डालता?" मैंने कहा, "फौजदार" उसने कहा, अब!...
काला हंसा! और अभी तक मुझे ये नहीं पता था कि ये हंसा है क्या! "काला हंसा?" मैंने पूछा, "जला हुआ" उसने कहा, दिमाग सुन्न! उन्न-झुन्न के उलटे सीधे...
फिर उसने मेरे माथे पर लगाया, अब मेरी नज़र उसके हाथ पर पड़ी! उन पर निशान थे, खून के निशान! या फिर माहवर के निशान, मेहँदी-महावर के निशान! उसने उस 'हंसा'...
अब वो रो पड़ी! बुरी तरह! फि चुप हुई! एक तरफ चल पड़ी, मैं भी चला साथ ही साथ! एक जगह उक गयी, ज़मीन पर झुक कर कुछ ढूंढने लगी, मैंने भी देखने लगा, ...
"वहाँ" उसने एक ओर इशारा किया, वहाँ कुछ नहीं था, बस जंगल ही जंगल! "कोई गाँव है वहाँ?" मैंने पूछा, "हाँ" वो बोली, "क्या नाम है गाँव का?" मैंने प...
नीचे नज़र किये हुए! "औरत है या आदमी?" मैंने पूछा, "आदमी" उसने कहा, सर झुका के ही, "कौन है वो तुम्हारा कैला?" मैंने पूछा, "आदमी मेरा" वो बोली, ...
पसीना मेरे माथे से होता हुआ चिल्लाता हुआ मेरी नाक के सहारे से होता हुआ ठुड्डी तक आया और कोई पनाह न मिलने के कारण ज़मीन में गिर ज़मींदोज़ हो गया! मैं आग...
कमर से नीचे का ही भाग दिखायी दे रहा था, मैं आगे बढ़ा, और आगे और दृश्य स्पष्ट हुआ! वो झुक कर खड़ी थी, जैसे ज़मीन में से कुछ निकाल रही हो, कुछ बीन रही हो! ...
वहाँ जा बैठे, एक चादर बिछा दी श्याम सिंह ने और हम वहीँ बैठ गए! मेरी नज़र फिर से उसी पगडण्डी पर पड़ गयी और जैसे मैं फिर से चिपक गया उसी रास्ते पर! "शर्...
