Last seen: Apr 7, 2026
और बिखेर दिए वो टुकड़े!वो टुकड़े, हवा में उठी!कांपने लगे!वो हंसी! हुई खड़ी!और थूका ज़मीन पर!हामुंड क्रिया थी ये!हामुंड में, डाकिनियों का आह्वान होता है!वे...
मैंने भस्म निकाली,और एक डोमाक्षी-विद्या से उसको संचरित भी कर लिया!उस स्त्री ने भी अब नृत्य करना आरम्भ कर दिया था!ये बंजारे,अक्सर मृत-देह के साथ ऐसा ही...
मैं जानता था, कि वो फिर से कोई चाल लड़ायेगा!इसीलिए तैयार था मैं,मैंने बैग लिया,खोला और उसमे से,भस्म निकाल ली,अभिमंत्रण किया,और अब अपने माथे से लगा ली,श...
हमारे मात्र केश उड़े! और आँखें बंद हुईं!और गुजर गयी वायु!विद्या के पोषण में न होते, तो मांस उड़ जाता हमारा, क़तरा क़तरा!सिर्फ कंकाल ही शेष रह जाता!ये, वाय...
अकेला ही!"तू अभी बालक है मेरे सामने!" बोला वो,"धीमणा! तू भले कुछ भी सही! लेकिन तू है एक प्रेत! इंसान नहीं!" कहा मैंने,उसने मारा ठहाका!और चबूतरा धसका!द...
शकरगंदी से छोटी, और काले रंग की,तांत्रिक-वस्तु है,शीघ्र ही अभिमंत्रण हो जाती है ये!उसके बाद इसको चबा लिया जाता है,कई औघड़ इसको, माला बनाकर, अपने गले मे...
मैंने फिर से उठाई मिटटी!पढ़ा इस बार दूसरे मंत्र से!उछाली ऊपर!वे झट से लोप!शर्मा जी आये मेरे पास दौड़ कर,"कहाँ गए?" पूछा उन्होंने,"यहीं हैं!" कहा मैंने,औ...
"सुन ले धीमणा! अबकी बार कोई आया, तो कोई नहीं बचेगा!" कहा मैंने,वो फिर से हंसा!और किया हाथ आगे!मैं और शर्मा जी, संतुलन खो बैठे अचानक से!और नीचे बैठते ग...
तो हम आगे चले!आये चबूतरे के पास!उसने पहले एक नज़र डाली हम पर,फिर झटके से देखा हमें!उठ बैठा वो फिर!"कौन हो तुम?" पूछा उसने,बड़ी ही रौबदार आवाज़ थी उसकी!भा...
कमर में कौड़ियों की माला धारण कर रखी थी!जूतियां पहने हुए था!सभी झुक गए!और उसका जयनाद सा होने लगा!लोग सर झुकाते हुए, चल पड़े उसकी तरफ!उस से दूर ही, नीचे ...
यही था असली बीज का भुट्टा!इसी के कारण ये सभी प्रेत यहां लौट आये थे!धीमणा सभी को जगा लाया था,लेकिन इस समय तक ये धीमणा था कहाँ?अगर लौटा था, तो ये सच में...
आया वो बड़ा चबूतरा!लोग बैठे थे नीचे,दरी बिछी थी वहां!और हम, वहीँ पीछे बैठ गए,पानी मिला पीने को,अफीम का घोटा आया, मना किया!वो ज़रूरी था, क्या करते, पीना ...
अब बीच में से स्थान ढूँढा,झाड़ियों से बचते हुए,चल पड़े आगे,गीत के स्वर अभी भी आ रहे थे!हम चलते रहे आगे,और आ गए रास्ते पर,दूर था गाँव,इक्का-दुक्का दीये द...
कुछ पर धार लगवायी थी,चार बजे तक लौट आये थे वापिस,आराम किया,शाम को,भोजन कर लिया था,और फिर रात के समय,हम अपना सामान लेकर,चल पड़े उस कुमारगढ़ी के पोखर के ल...
कमाल दिखाने लगा था अपना!जम्हाई आने लगी थीं!बस अब तो चारपाई मिले और देह तोड़ें उसमे अपनी!आये गाड़ी तक, किशन जी सो गए थे, जागे,और हम चले वापिस,उनको थोड़ा-ब...
