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‘उद्धार! उद्धार!” मैंने याचना की! लघुन्डा ने मुझे देखा, मैंने भोग अर्पित कर दिया! महातामसी लघुन्डा ने मुझे प्राण-दान दिए! मेरा उद्देश्य पूर्ण हु...
और तभी झन्न! झन्न से एक अग्नि पिंड प्रकट हुआ! द्रूप-बालिका का आगमन हो चुका था! पकट हो गयी वहाँ द्रूप बालिका! घनघोर शोर करते हुए! जैसे पानी के भं...
मसानी आने का ये संकेत था कि द्रूप-बालिका बस किसी भी क्षण आने को है वहाँ! यहाँ! यहाँ मैं लगातार मंत्रोच्चार करता जा रहा था! गहन, और गहन! और फिर त...
नियंत्रित कीं और फिर से फट्ट मंत्र मेरे मस्तिष्क में गूंजने लगे! लगा कि जैसे बहुत सारे वृक्ष भूमि पर गिरने के लिए विवश किये गए हों! सभी परिंदे अपना घर...
हाँ, तो वहाँ बैजनाथ आह्वान करने में लीन था और मैं भी! वे दोनों औघड़ भी उस जाप में लीन थे! ये सहायक थे उसके! उसकी एक साध्वी नीचे गिरी थी और एक पर अब क...
“द्रूप बालिका!” अच्छा! समझ गया! वो अब द्रूप बालिका का आह्वान करना चाहता था! जान गया मैं! द्रूप बालिका एक भयानक शक्ति है! नदी का तल इसका वास है...
बैजू सोच रहा था कि मैं उसका अहित करना चाहता हूँ! नहीं! ऐसा नहीं था, मैं उन दोनों औघड़ों को सबक सिखाना चाहता था! और तब यहाँ जैसे जैसे वो आकृतियां खंडि...
सेविकाओं सहित लोप हो गयी! मैंने उस वृत्त के नीचे लेट गया! आँखों में आंसू आ गए! मुझे मृत्यु का ग्रास बनने से पहले ही मेरी संजीवनी बन गयी थी द्रोमा-चंडा...
मेरी साध्वी फिर से खड़ी होने वाली थी, अब मैंने अपना त्रिशूल उठाया और त्रिशूल को छुआ और अपने अस्थिमाल से लगाया, और फिर उसको तरफ कर दिया, वो उछल पड़ी, नीच...
तभी मेरे यहाँ रक्त की बूँदें बरसने लगीं! घनघोर! मैंने मंत्र पढ़ते हुए ही त्रिशूल को अलख में छुआ कर भूमि पर त्रिकाल चिन्ह खींच दिया! बरसात बंद हुई, मेरे...
तभी बैजू खड़ा हुआ! और घोर-नृत्य करने लगा! ये कर्णाक्षी का आह्वान था! मुझे भी किसी महारौद्र शक्ति की आवश्यकता थी! तभी मेरे मन में मेरे गुरु के कहे शब्द ...
“साधिका?” मैंने फिर से पुकारा! कोई असर नहीं! अब मुझे क्रोध आया, लेकिन क्रोध को पीना पड़ा मुझे! क्रोध का कोई औचित्य नहीं था वहाँ! मैंने फिर से त्र...
वो खड़ा हुआ और मैं भी! उसने भी नमन किया और मैंने भी! अपनी अपनी आराध्या को! बैजू ने उद्देश्य बताया! और चल पड़ी मदमाती जम्बूख वहाँ से, जैसे कोई उड़ता...
वहाँ बैजनाथ अपनी एक साधिका के वक्ष-स्थल पर बैठा मंत्रोच्चार कर रहा था, वे औघड़ वैसे ही लेटे थे! तभी मेरे कानों में ध्वनि पड़ी! जम्बूख! ओह! तो वो ज...
अब उसने अपने सहायक औघड़ों को कुछ आदेश दिया! औघड़ वहीँ लेट गए, आधे गड्ढे में और आधे बाहर! अब मैंने अपने यहाँ अपनी मुद्रा सम्भाली! मैंने अपनी साध्वी को ...
