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गुरुजी के संस्मरण
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Topic starter
17/10/2024 11:08 am
“अब सुनो जो मै तुमको बता रहा हूँ!” मैंने कहा,
और मित्रगण! फिर मैंने सारी घटना उनके सामने व्यक्त कर दी! उसनके तो जैसे होश फाकता हो गए! हाँ मैंने एक रेखा खींच दी थी! वही रेखा जो उनको यहाँ के बंधनों से मुक्त कर देगी! मैंने उनको बताया कि अनिया वहाँ खड़ी है, वहाँ इंतज़ार कर रही है, तुम सब जाओ और मिल लो उस से! एक एक करके वो बेचारे सभी रेखा पार कर गए! मुक्त तो नहीं हुए थे अभी लेकिन अब सच्चाई स्वीकार कर ली थी उन्होंने!
मै फिर वापिस दिल्ली आया और एक पावन मुहुर्त पर उनको मुक्त कर दिया!
उस दिन के बाद से उस हवेली में ऐसा कुछ भी नहीं हुआ!
हाँ केतक, जसराज और अनिया का मुझे कभी पता न चल सका!
----------------------------------साधुवाद-----------------------
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