साल 2021: उदयपुर के पास की एक घटना
बात साल 2021 की है! सितंबर का महीना चल रहा था! देश अभी पूरी तरह कोरोना महामारी के भय से बाहर नहीं निकला था! कोरोना की दूसरी लहर ने न जाने कितने परिवारों को बर्बाद किया था! गांव हो या शहर, हर व्यक्ति के मन में बीमारी को लेकर एक अलग ही डर बैठ गया था!
उस दौर में अगर किसी घर में कोई व्यक्ति बीमार पड़ जाता था तो परिवार के लोग पहले कोरोना की जांच करवाते, फिर अलग-अलग डॉक्टरों के चक्कर शुरू हो जाते! लेकिन कई बार ऐसी बीमारियां भी सामने आ रही थीं, जिनका सही कारण डॉक्टर भी तुरंत समझ नहीं पा रहे थे!
उन्हीं दिनों की एक घटना है!
उस दिन मैं अपने आश्रम पर बैठा हुआ था! दिन सामान्य था! आश्रम का वातावरण भी रोज की तरह शांत था! कुछ लोग अपने काम से आ-जा रहे थे, कुछ लोग मिलने के लिए बैठे हुए थे! मैं भी अपने दैनिक कार्यों से कुछ समय निकालकर बैठा था!
तभी मेरे एक परिचित नरेंद्र जी आश्रम पर आए!
नरेंद्र जी को मैं पहले से जानता था! उनका मेरे यहां आना-जाना भी था, इसलिए उनके चेहरे के भाव देखकर ही मुझे कुछ अलग लगा! आमतौर पर वो काफी सहज और सामान्य दिखाई देते थे, लेकिन उस दिन उनके चेहरे पर चिंता साफ नजर आ रही थी!
वो मेरे पास आकर बैठे जरूर, लेकिन जैसे उनका मन कहीं और ही था!
कुछ देर तक इधर-उधर की सामान्य बातें होती रहीं! मगर मैं महसूस कर रहा था कि नरेंद्र जी किसी बड़ी परेशानी में हैं! वो बार-बार चुप हो जाते थे और गहरी सोच में खो जाते थे!
आखिर मैंने उनसे पूछ ही लिया!
“क्या बात है नरेंद्र जी? आज आप कुछ ज्यादा ही परेशान दिखाई दे रहे हो! सब ठीक तो है?”
मेरे इतना पूछते ही वो कुछ क्षण तक चुप रहे! फिर एक लंबी सांस लेते हुए बोले,
“गुरुजी, क्या बताऊं... पिछले एक साल से घर में ऐसी परेशानी चल रही है कि समझ नहीं आ रहा क्या करें और किसके पास जाएं!”
मैंने कहा, “शांत होकर बताओ, आखिर बात क्या है?”
उन्होंने कहा, “छोटे भाई सुरेंद्र को लेकर बहुत चिंता है! करीब एक साल से वो किसी अनजान बीमारी से पीड़ित है! आज तक कोई यह ठीक से नहीं बता पाया कि आखिर उसे हुआ क्या है!”
अब मेरी उत्सुकता भी बढ़ गई थी!
क्रमशः...
मैंने पूछा, “क्या बीमारी है? क्या लक्षण हैं?”
नरेंद्र जी ने बताया, “शुरुआत में तो हमें भी लगा था कि कोई सामान्य बीमारी होगी! किसी ने कहा पीलिया है। किसी डॉक्टर ने नसों की कमजोरी बताई! किसी ने शरीर में संक्रमण की बात कही! हमने हर किसी की सलाह मानी, इलाज करवाया, दवाइयां दिलवाईं, लेकिन धीरे-धीरे उसकी हालत बिगड़ती चली गई!”
वो बोलते-बोलते कुछ भावुक हो गए!
उन्होंने कहा, “गुरुजी, आज हालत ये है कि सुरेंद्र पिछले करीब एक साल से ठीक से बोल भी नहीं पा रहा है! चलना तो बहुत दूर की बात है! वो बिस्तर से उठ भी नहीं पाता! पूरा दिन बिस्तर पर ही पड़ा रहता है!”
मैं चुपचाप उनकी बातें सुनता रहा!
नरेंद्र जी ने आगे कहा, “उसकी हालत इतनी खराब हो चुकी है कि उसके नित्य कर्म तक बिस्तर पर ही करवाने पड़ते हैं! परिवार का कोई न कोई सदस्य हर समय उसके पास रहता है। पहले तो हमें उम्मीद थी कि इलाज से धीरे-धीरे ठीक हो जाएगा, लेकिन अब हालात ऐसे हो गए हैं कि पूरा परिवार टूट चुका है!”
मैंने उनसे पूछा, “इतने दिनों में किसी बड़े डॉक्टर को नहीं दिखाया क्या?”
उन्होंने कहा, “गुरुजी, ऐसा कोई प्रयास नहीं छोड़ा जो हम कर सकते थे! स्थानीय डॉक्टरों को दिखाया! फिर बड़े अस्पतालों में ले गए! सूरत गए, अहमदाबाद गए और भी कई जगह डॉक्टरों को दिखाया! जांच पर जांच करवाईं! हजारों रुपए इलाज में खर्च हो गए, लेकिन बीमारी का असली कारण किसी की समझ में नहीं आया!”
मैंने पूछा, “डॉक्टर क्या कहते हैं?”
नरेंद्र जी बोले, “हर डॉक्टर अपनी समझ के हिसाब से इलाज करता रहा! कोई कहता नसों की बीमारी है, कोई शरीर की कमजोरी बताता! लेकिन दवाइयां बदलती रहीं और सुरेंद्र की हालत वैसी की वैसी बनी रही!”
थोड़ी देर रुककर उन्होंने मेरी तरफ देखा और धीमी आवाज में कहा,
“गुरुजी, जब डॉक्टरों से भी कोई फायदा नहीं हुआ तो परिवार के लोगों ने दूसरी जगहों पर भी दिखाना शुरू कर दिया!”
मैं समझ गया कि उनका इशारा किस तरफ है!
उन्होंने कहा, “बहुत से भोपा, ओझा और तांत्रिकों को घर बुलाया! किसी ने कुछ क्रिया बताई, किसी ने पूजा करवाई, किसी ने कहा घर में कोई बाधा है! हमने वो भी किया! उस समय परिवार की हालत ऐसी थी कि जो भी उम्मीद दिखाता, हम उसके पास चले जाते!”
“लेकिन?” मैंने पूछा!
उन्होंने निराश स्वर में कहा, “लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ गुरुजी। बिल्कुल भी नहीं!”
अब उनके चेहरे पर गहरी थकान दिखाई दे रही थी!
उन्होंने कहा, “एक साल हो गया! हम भाई को हर जगह लेकर गए! परिवार के लोग भी अब मानसिक रूप से थक चुके हैं! मां की हालत अलग खराब है! घर में हर समय यही चिंता रहती है कि आखिर सुरेंद्र को हुआ क्या है और वो कभी ठीक हो पाएगा या नहीं!”
उनकी बातों से साफ लग रहा था कि यह सिर्फ एक मरीज की बीमारी नहीं थी! पूरा परिवार उस बीमारी के साथ पिछले एक साल से जी रहा था!
मैंने पूछा, “तो आज कहां जाने की तैयारी है?”
नरेंद्र जी बोले, “आज अहमदाबाद ले जाने की तैयारी है! एम्बुलेंस भी बुला ली है! पहले भी वहां दिखाया था, लेकिन इस बार एक डॉक्टर ने कहा है कि मरीज को भर्ती करवा दीजिए! वो कोशिश करने की बात कर रहे हैं!”
फिर उन्होंने कहा, “गुरुजी, सच कहूं तो अब हमें किसी पर भरोसा नहीं रहा! इतने डॉक्टर देख लिए, इतने इलाज करवा लिए! हर बार लगता था कि अब ठीक हो जाएगा, लेकिन फिर वही हालत!”
इतना कहकर वो कुछ देर चुप रहे!
फिर अचानक उन्होंने मेरी तरफ देखा!
उनकी आंखों में एक अलग ही उम्मीद दिखाई दे रही थी!
उन्होंने कहा, “गुरुजी, मैं आज सिर्फ आपसे मिलने नहीं आया हूं! मैं आपसे एक उम्मीद लेकर आया हूं!”
मैं उनकी बात समझने की कोशिश करने लगा!
उन्होंने कहा, “लोगों से आपके बारे में सुना है! कई लोगों ने बताया कि आप अलग-अलग प्रकार की क्रियाओं और उपचार पद्धतियों की जानकारी रखते हैं! इसलिए सोचा कि अहमदाबाद जाने से पहले आपसे मिल लूं! शायद आपकी तरफ से भी कोई रास्ता निकल आए!”
मैंने तुरंत कोई जवाब नहीं दिया!
मेरे सामने बैठे नरेंद्र जी की हालत देखकर साफ लग रहा था कि वो पिछले कई महीनों से उम्मीद और निराशा के बीच झूल रहे हैं! मैं यह भी समझ रहा था कि किसी परिवार के लिए अपने जवान बेटे या भाई को एक साल तक बिस्तर पर पड़े देखना कितना मुश्किल होता है!
नरेंद्र जी ने हाथ जोड़ते हुए कहा,
“गुरुजी, आप भी एक बार मेरे भाई के लिए प्रयास करिए! मैं आपसे कोई चमत्कार की उम्मीद नहीं कर रहा, लेकिन अब जहां से भी थोड़ी सी उम्मीद दिखाई देती है, हम वहां चले जाते हैं!”
उनकी यह बात मेरे मन को छू गई!
मैंने उन्हें शांत रहने के लिए कहा और बोला,
“नरेंद्र जी, आप पहले बैठिए! किसी भी निष्कर्ष पर जल्दी पहुंचना ठीक नहीं है! मैं पहले अपने तरीके से स्थिति को समझने की कोशिश करूंगा! वास्तविकता क्या है, यह जानना जरूरी है! उसके बाद ही मैं आपको कुछ कह पाऊंगा!”
नरेंद्र जी मेरे सामने चुपचाप बैठे रहे!
@1008 वाह। नए संस्मरण के लिए कोटिश धन्यवाद 🙏 उचित निर्णय लिया नरेंद्र जी ने जो भारती करने से पहले आश्रम के आए, अब आगे गुरुजी की जांच के बाद ही पता लगेगा कि उनके अनुज को सच में कोई असाध्य रोग है अथवा शत्रुता वश कोई क्रिया की गई है।
@1008 प्रणाम दादा नए संस्मरण के लिए कोटिश प्रणाम और धन्यवाद
नए संस्मरण के लिए आभार
नए संस्मरण के लिए धन्यवाद प्रभु
प्रणाम गुरुदेव,
प्रणाम sirji,
रेगिस्तान में आपने बूंदाबांदी शुरू करदी, बहुतबहुत धन्यवाद,
बस अब झमाझम की प्रतीक्षा है,
पुनः बहुत बहुत धन्यवाद.
नरेंद्र जी की पूरी बात सुनने के बाद मैंने मन ही मन स्थिति को समझने की कोशिश की! इसके बाद मैं उस स्थान पर गया, जहां मैं अपनी साधना और क्रियाओं के माध्यम से स्थिति को देखता था!
मैंने अपनी देख शक्ति को उठाया और कुछ ही देर में मुझे उसका उत्तर मिल गया!
उत्तर मिलने के बाद मेरे लिए वहां जाना जरूरी हो गया था!
मैंने नरेंद्र जी से कहा,
“चलो, अब आपके घर चलते हैं! वहां कुछ चीजें देखनी होंगी और आवश्यक सामग्री भी लेनी पड़ेगी!”
नरेंद्र जी शायद पहले से ही मेरी बात के लिए तैयार बैठे थे! उन्होंने ज्यादा कुछ नहीं पूछा! बस उठे और मेरे साथ चलने लगे!
मैंने अपनी तरफ से जरूरी मंत्र आदि जाग्रत किए और थोड़ी देर बाद हम उनके घर के लिए निकल पड़े!
उनका घर आश्रम से करीब 25 किलोमीटर दूर था! ग्रामीण इलाका था, इसलिए रास्ते में शहर जैसी भीड़भाड़ नहीं थी! करीब आधे घंटे में हम उनके घर पहुंच गए!
घर बिल्कुल ग्रामीण परिवेश का था!
बाहर गाय बांधने की जगह बनी हुई थी! उसके आगे बैठक जैसी जगह थी, जहां परिवार के लोग बैठते होंगे! हम जैसे ही घर के बाहर पहुंचे, नरेंद्र जी ने परिवार वालों को हमारे आने की जानकारी दी!
वहां उनके माता-पिता भी मौजूद थे!
मैंने दोनों को नमस्कार किया! उन्होंने भी सम्मान से जवाब दिया! घर का माहौल देखकर पहली नजर में ऐसा कुछ नहीं लगा कि यहां कोई असामान्य बात हो सकती है!
लेकिन...
जैसे ही मैं घर के अंदर की तरफ बढ़ा, मुझे कुछ अलग महसूस हुआ!
मैं कुछ कदम ही अंदर गया था कि अचानक एक अजीब सी गंध मेरी नाक में आई!
मैं वहीं कुछ क्षण के लिए रुक गया!
वह सामान्य गंध नहीं थी!
मुझे हड्डियों जैसी गंध महसूस हुई!
और उसके साथ ही ऐसी गंध, जैसी किसी मुर्दे के जलने के बाद आती है!
मैंने आसपास देखा"
घर में सब कुछ सामान्य था!
न कोई ऐसी चीज दिखाई दे रही थी, जिससे इस तरह की गंध आने की वजह समझ में आए और न ही वहां ऐसा कोई वातावरण था कि मुझे तुरंत कोई कारण समझ आ सके!
मैंने मन ही मन सोचा—
“यह गंध यहां क्यों आ रही है?”
नरेंद्र जी मेरे साथ ही थे! शायद उन्होंने मेरे चेहरे के भाव में कुछ बदलाव देखा होगा, लेकिन मैंने उस समय उनसे कुछ नहीं कहा!
मैं आगे बढ़ा!
घर में परिवार के लोग अपने सामान्य काम में लगे थे! किसी को शायद अंदाजा भी नहीं था कि घर के अंदर कदम रखते ही मुझे क्या महसूस हुआ है!
लेकिन मेरे लिए यह बात साधारण नहीं थी!
क्योंकि कुछ देर पहले जिस शक्ति से मैंने स्थिति को देखने का प्रयास किया था, वहां से जो संकेत मिला था, वह मेरे मन में अभी भी साफ था!
और अब घर में प्रवेश करते ही वही संकेत किसी दूसरी तरह से सामने आने लगा था!
मैंने नरेंद्र जी की तरफ देखा!
उन्होंने पूछा,
“गुरुजी, क्या हुआ?”
मैंने सहज होकर कहा,
“कुछ नहीं... पहले सुरेंद्र को देख लेते हैं!”
असल में मैं उस समय बिना जल्दबाजी के पूरी स्थिति को समझना चाहता था!
हम आगे बढ़े!
जिस कमरे में सुरेंद्र था, उस तरफ जाते हुए मेरे मन में कई सवाल उठने लगे थे!
एक साल से बिस्तर पर पड़ा हुआ आदमी...
डॉक्टरों की अलग-अलग बातें...
सूरत और अहमदाबाद तक इलाज...
भोपा, ओझा और तांत्रिकों के चक्कर...
और अब घर में प्रवेश करते ही मुर्दे के जलने जैसी गंध...
इन सब बातों को जोड़ने पर मामला सामान्य नहीं लग रहा था!
लेकिन अभी मेरे सामने सबसे महत्वपूर्ण चीज बाकी थी—
सुरेंद्र को देखना!
वह किस हालत में है?
उसके आसपास का वातावरण कैसा है?
और जो संकेत मुझे पहले मिला था, उसका वास्तविक संबंध किस चीज से है?
मैं धीरे-धीरे उस कमरे की ओर बढ़ा, जहां सुरेंद्र पिछले करीब एक साल से बिस्तर पर पड़ा था!
मुझे नहीं पता था कि अगले कुछ मिनटों में जो मैं देखने वाला था, वह इस पूरी घटना की दिशा ही बदल देगा...
क्रमशः
नए संस्मरण के लिए बहुत बहुत धन्यवाद गुरूजी।।
