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सिद्ध योगी साधना! ये साधना परमोच्च साधनाओं में से एक है! कुल ऐसी साधनाओं की संख्या कुल आठ है! अधिक विवरण नहीं कर सकता, और करूंगा भी नहीं! न तो इसे सर...
बोड़ा बाबा सब देख रहे थे! सब का सब! ये सम्भवतः दूसरी बार उनकी अलख उड़ा दी गयी थी! बाबा का तो अहित नहीं हुआ लेकिन वे दोनों, पागलों की तरह से चिल्लाने लगे...
"जीवेश?" कहा मैंने, बार बार कहता था! अभी तो यहीं था? कहाँ गया? वो तो संग ही था मेरे? कहां चला गया? क्या कोई दुर्घटना हुई उसके साथ? कहां लोप हो गया? मे...
"कोई और नहीं?'' पूछा मैंने,"नहीं!" कहा उसने,"उधर एक योगी हैं!" कहा मैंने,"कहाँ?" पूछा उसने,हम दोनों ऐसे खुसर-फुसर बातें कर रहे थे जैसे अँधेरे में सेंध...
मेरे यहां मेरी अलख भी शांत पड़ने ही वाली थी, जीवेश उसमे प्राणरूपी ईंधन झोंक देता था! मुझे हैरत तो इस बात पर थी, कि वो बड़बोला, बड़ंग 'बाबा' ये तपन, कैसे ...
उस शव की कोई मुद्रा भी देख ले, आम इंसान तो सच कहता हूँ, आत्मा उसकी भय के रथ पर सवार हो कर, भयमिश्रित भाव से, इस संसार से कूच कर जाए! मैंने स्वयं ऐसी भ...
उन्होंने वो कपाल उठाया, जो शिशु-कपाल था, अपने सम्मुख लाये उसे! अलख की भस्म का टीका किया उसे! और किया सामने! तीन बार उछाला उसे, और चौथी बार में सीधा ऊप...
और फिर अपने नेत्र खोल दिए! तपन नाथ से कुछ कहा उन्होंने, तपन नाथ भाग लिया वहां से! शायद कुछ मंगवाया गया था उस से! तब तक बाबा बोड़ा वहीँ खड़े रहे! अपना त्...
लगता था कि जैसे हम अग्नि की किसी कंदरा में घुसे हुए हों! जिसके दो द्वार हों, बाहर भी अग्नि ही अग्नि हो! उस द्वार, इस द्वार! हाँ, वो अग्नि, बस हमें नही...
मुझे एक क्षण इस तपन नाथ पर दया आ गयी! बस एक क्षण के लिए! दया, उसकी मूर्खता पर! उसके पास ऐसा महासाधक था, जो उसे कहीं का कहीं पहुंचा सकता था! उस साधक की...
वे पीछे पलटे और एक त्रिशूल उठाया उन्होंने! ये त्रिशूल उन्हीं का होगा! उन्हीं के बराबर के अनुपात वाला! ये त्रिशूल कम कम छह फ़ीट का रहा होगा, उसका फाल ऐस...
जिस समय कपाल फूटे वहां, तपन नाथ का दिल फूटा वो देख देख! बाबा बोड़ा के पीछे जा बैठा वो धूर्त सरभंग! कांप भी रहा होगा तो कहा नहीं जा सकता कि नहीं! और बाब...
ढप्प! ढप्प! गयी मेरी निगाह सामने, ढप्प! बाएं! दाएं! ढप्प! मांस के लोथड़े, अस्थियां, अस्थि-खण्ड, कपाल के फूटे हुए टुकड़े, शिशुओं के विदीर्ण शरीर, लाल-रक्...
दम्भ के मान में फूला, किसी के सरंक्षण की सुरक्षा में बंधा, गाल फाड़े जा रहा था! भर भर के हंसता था! हंसते हंसते, सांस भी घुटने लगती थी उसकी! उसे तो जैसे...
जैसे ही मैंने मां शैवाकि का नाम लिया, वहां तो वे दोनों ही मुस्तैद हो गए! देख अब परस्पर जुडी थी! श्रवण चल ही रहा था! घोर द्वन्द के पहले के आह्वान थे ये...
